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आस्था का केंद्र लोहरामऊ धाम, सावन में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब

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सैकड़ों वर्षों पुरानी मान्यता से जुड़ा है मंदिर का इतिहास, दूर-दराज जिलों से दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु

भदैया, सुलतानपुर। सुल्तानपुर जिले में लखनऊ-वाराणसी हाईवे पर स्थित लोहरामऊ दुर्गा माता धाम आज क्षेत्र ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि मां के दरबार में सच्चे मन से पहुंचने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सावन मास में यहां लगने वाले तीन दिवसीय मेले में हजारों श्रद्धालु पहुंचकर माता के चरणों में शीश नवाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

कोतवाली देहात क्षेत्र के लोहरामऊ (धर्मदासपुर) गांव में स्थित यह प्राचीन मंदिर सालभर भक्तों की आस्था का केंद्र रहता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां नौ दिनों तक धार्मिक आयोजन होते हैं, वहीं सावन मास में नाग पंचमी के बाद पड़ने वाले सोमवार और शुक्रवार से तीन दिवसीय मेले की शुरुआत होती है। मेले के दौरान अमेठी, रायबरेली, प्रतापगढ़, अयोध्या, जौनपुर सहित कई जिलों से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

अनूठी है पूजा की परंपरा

लोहरामऊ मंदिर की पूजा परंपरा भी अन्य देवी मंदिरों से अलग मानी जाती है। यहां श्रद्धालु माता को हलवा-पूरी, गुड़-धनिया सहित अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर में बूंदी के लड्डू का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा नहीं है। पशुओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना से लोग घंटी और लौंग भी चढ़ाते हैं। 70 वर्षीय गौरा गांव निवासी लक्ष्मी शंकर पांडेय बताते हैं कि वर्षों से लोग सावन मेले में पहुंचकर माता के दरबार में पूजा-अर्चना करते हैं। उनका कहना है कि श्रद्धालुओं की आस्था इस मंदिर से गहराई से जुड़ी हुई है और दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं।


जंगल से शुरू हुई आस्था की कहानी

लोहरामऊ मंदिर का इतिहास भी काफी पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार करीब दो दशक पहले यहां घना जंगल हुआ करता था। ग्रामीण अपने पशुओं को चराने के लिए इस क्षेत्र में आते थे। इसी दौरान नीम के पेड़ के नीचे स्थित स्थान पर मां भगवती के स्वरूप का दर्शन होने की बात सामने आई। इसके बाद ग्रामीणों ने वहां चबूतरा बनाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और वर्ष 1991 में पत्थर एवं संगमरमर से मां भगवती की भव्य प्रतिमा स्थापित कर विशाल मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर परिसर में मां दुर्गा के अलावा हनुमान जी, श्रीराम दरबार, राधा-कृष्ण और शिवलिंग सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।

राजघराने की कथा से भी जुड़ी मान्यता

मंदिर से जुड़ी एक पुरानी लोककथा भी क्षेत्र में प्रचलित है। ग्रामीणों के अनुसार भदैया के राजा बाबू राजघराने पर संकट आने के समय लोगों ने दुर्गा माता की आराधना कर सहायता की प्रार्थना की थी। मान्यता है कि इसके बाद आए तेज तूफान में राजा का सिर कटा हुआ मिला था, जिसके कारण उस स्थान को आज भी "मुड़कटनी बाग" के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर के पुराने अवशेषों में मिली लाखोरी ईंटें इसके प्राचीन इतिहास की ओर संकेत करती हैं। हालांकि वर्तमान स्वरूप में मंदिर का निर्माण वर्ष 1991 में कराया गया। सफेद संगमरमर से बनी मां भगवती की प्रतिमा मंदिर की प्रमुख आकर्षण का केंद्र है।

श्रद्धा और विश्वास का संगम

आज लोहरामऊ दुर्गा माता धाम केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। सावन मेले के दौरान यहां भक्ति, आस्था और सामाजिक एकता का अनूठा संगम देखने को मिलता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां के दरबार से कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।

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