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कागजों में ‘हर घर जल’, हकीकत में प्यासा मुढारी

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कुलपहाड़ (महोबा)।जल जीवन मिशन—जिसका सपना था हर घर जल, मुढारी गांव में आज खुद सवालों के कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। कागजों में योजना पूरी, भुगतान पूरे,—लेकिन जमीनी हकीकत यह कि ग्रामीण आज भी एक-एक बूंद पानी को तरस रहे हैं।
प्रदेश में उस वक्त राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई, जब जल जीवन मिशन को लेकर कैबिनेट मंत्री और भाजपा विधायक के बीच टकराव की खबरें सामने आईं। इसी बीच मुढारी गांव की हकीकत ने सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी।
नल तो लगे, पर पानी आज तक नहीं टपका
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों पहले घरों में नल कनेक्शन तो दे दिए गए, लेकिन वे अब सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं। नीले पाइप आज तक एक बूंद पानी नहीं उगल पाए। जल जीवन मिशन योजना मुढारी में मजाक बनकर रह गई है।
खुदाई कर छोड़ दी सड़कें, कीचड़ में तब्दील गलियां
ठेकेदारों द्वारा पाइपलाइन डालने के नाम पर की गई खुदाई के बाद सड़कों की मरम्मत तक नहीं कराई गई। परिणामस्वरूप गांव की गलियां कीचड़ और दलदल में तब्दील हो गईं। कई स्थानों पर पाइपलाइन लीकेज के कारण हालात और बदतर हैं।
40 प्रतिशत से अधिक रास्तों में पाइपलाइन ही नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि गांव की मुख्य गलियों सहित 40 प्रतिशत से अधिक रास्तों में आज तक पाइपलाइन डाली ही नहीं गई। जहां डाली भी गई, वहां पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हुई। अधिकांश मोहल्ले योजना से पूरी तरह अछूते हैं।
जहां पानी आया भी, वहां गंदा और कीचड़युक्त
कुछ इलाकों में नाममात्र की जल आपूर्ति हुई भी है, तो वह कीचड़युक्त और दूषित पानी है, जिसे पीना तो दूर, इस्तेमाल करना भी मुश्किल है। बार-बार शिकायतों के बावजूद न तो पाइप जोड़े गए और न ही व्यवस्था सुधारी गई।
ग्रामीणों का सवाल—क्या मुद्दा न उठता तो लीपापोती चलती रहती?
देवेंद्र राठौर, सुजीत राजपूत, दिलीप सेन, रोहित तिवारी, राहुल मिश्रा, ब्रजेश नागायच, जैनेन्द्र राजपूत, गोविंद तिवारी, विजयकांत पुरोहित, दिनेश कुशवाहा, प्रेमनारायण नामदेव, मनोज रैकवार, नीरज अहिरवार सहित ग्रामीणों ने तीखा सवाल उठाया—
“अगर जल जीवन मिशन की बदहाली का मुद्दा सामने न आता, तो क्या इसी तरह कागजों में ही गांव को पानी मिल जाता?”
जिम्मेदारों की चुप्पी पर भी सवाल
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब हालात इतने बदतर हैं, तो फिर निरीक्षण रिपोर्ट में सब कुछ “संतोषजनक” कैसे दिखाया गया? क्या ठेकेदारों को खुली छूट दी गई? और क्या जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे?
अब देखना यह है कि जल जीवन मिशन की इस पोलखोल के बाद जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर मुढारी की प्यास यूं ही सरकारी फाइलों में दबा दी जाएगी।

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