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शीतला अष्टमी सनातन धर्मियो के महत्व पूर्ण त्योहार

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शीतला अष्टमी मनाने के पीछे कई बैज्ञानिक तथ्य छिपे हुए है। गर्मी शुरू होते ही किस तरह का खान पान हो यह संकेत शीतला अष्टमी देती है। इस बार शीतला अष्टमी 11 मार्च को मनाई जा रही है।इसके बैज्ञानिक कारणों पर प्रकाश डाल रहे है। हमारे रीजनल हेड चंद्रपाल सिंह सेंगर 
           शीतला अष्टमी पर विशेष
 भारतीय संस्कृति में त्योहारों का संबंध न केवल धार्मिक आस्था से है, बल्कि इनका गहरा जुड़ाव स्वास्थ्य और ऋतु परिवर्तन से भी है। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी का पर्व इसका सबसे सटीक उदाहरण है। इस वर्ष 2026 में यह पर्व परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। लोक भाषा में इसे 'बसोड़ा' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'बासी भोजन का उत्सव'।
मान्यता है कि इस दिन शीतला माता की आराधना करने से परिवार में चेचक, खसरा और आंखों की बीमारियों जैसे संक्रमणों से रक्षा होती है। आइए जानते हैं इस पर्व की परंपराओं, इसके पीछे की पौराणिक कथाओं और हल्दी के विशेष प्रयोग के रहस्यों के बारे में।
ऋतु परिवर्तन और माता शीतला का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता शीतला को स्वच्छता और शीतलता की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे नीम के पत्तों से सजी हुई हैं, उनके एक हाथ में कलश (आरोग्य का प्रतीक) और दूसरे में झाड़ू (स्वच्छता का प्रतीक) है। वे गर्दभ (गधा) की सवारी करती हैं।
चैत्र का महीना वह समय होता है जब सर्दियाँ पूरी तरह विदा हो रही होती हैं और गर्मियों का आगमन होता है। इस संधि काल में शरीर में पित्त और गर्मी का प्रभाव बढ़ने लगता है, जिससे कई प्रकार के रोग पनपते हैं। माता शीतला की पूजा हमें संदेश देती है कि हम अपने जीवन में स्वच्छता अपनाएं और शरीर को शीतल रखें।
'बसोड़ा' की अनूठी परंपरा: क्यों नहीं जलता इस दिन चूल्हा?
शीतला अष्टमी की सबसे विशिष्ट परंपरा यह है कि इस दिन घरों में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। भक्त एक दिन पहले (सप्तमी की रात) ही सारा भोजन तैयार कर लेते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता शीतला को 'शीतलता' अत्यंत प्रिय है। उन्हें अग्नि या गर्म वस्तुएं पसंद नहीं हैं। इसलिए, उन्हें प्रसन्न करने के लिए बासी यानी ठंडा भोजन अर्पित किया जाता है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता, जो इस बात का प्रतीक है कि अब गर्म तासीर वाले भोजन को त्याग कर ठंडी तासीर वाले पदार्थों का सेवन शुरू कर देना चाहिए।
मीठे चावल (ओलिया): दही और गुड़ के साथ बने चावल।
पूड़ी और पुआ: जो एक दिन पुराने होने पर भी खराब नहीं होते।
कढ़ी और राबड़ी: ठंडी कढ़ी का विशेष महत्व है।
इस पर्व में हल्दी का प्रयोग केवल एक रस्म नहीं, बल्कि एक उपचार के रूप में देखा जाता है। लेख के अनुसार, शीतला अष्टमी पर माता को हल्दी मिले जल से स्नान कराने की परंपरा है।
पवित्रता का प्रतीक: हल्दी को सनातन धर्म में सबसे शुद्ध और शुभ माना गया है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मंगल का संचार करती है।
जिस जल से माता का अभिषेक होता है, उसे घर के कोने-कोने में छिड़का जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से हल्दी एक शक्तिशाली 'एंटी-सेप्टिक' और 'एंटी-बायोटिक' है। जल के छिड़काव से वातावरण शुद्ध होता है और सूक्ष्म जीवाणुओं का नाश होता है।
 माता के चरणों का हल्दी युक्त जल बच्चों की आंखों और माथे पर लगाया जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चों की दृष्टि तेज होती है और वे संक्रमण से सुरक्षित रहते हैं।
शीतला अष्टमी के दिन एक और मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है—घरों के मुख्य द्वार पर हल्दी के छाप (हाथों के निशान) लगाना l हल्दी के ये निशान इस बात का संकेत हैं कि घर माता शीतला के संरक्षण में है। यह घर में सुख-शांति और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करता है।
 ग्रामीण अंचलों में यह मान्यता है कि हल्दी के छाप लगाने से घर को किसी की नजर नहीं लगती और परिवार के सदस्य निरोगी रहते हैं।
जैसा कि हम जानते हैं, चैत्र मास आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 
शीतला अष्टमी का पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलना ही उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है। बासी भोजन का भोग और हल्दी का प्रयोग हमें स्वच्छता, सादगी और प्राकृतिक चिकित्सा की ओर लौटने का संदेश देता है।
इस वर्ष जब आप माता शीतला की पूजा करें, तो केवल परंपरा के लिए नहीं, बल्कि अपने और अपने परिवार के बेहतर स्वास्थ्य के संकल्प के साथ इस पर्व को मनाएं। माता शीतला की कृपा आप सभी पर बनी रहे और आपका घर रोगों से मुक्त रहे। शीतला अष्टमी का पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलना ही उत्तम स्वास्थ्य की कुंजी है। बासी भोजन का भोग और हल्दी का प्रयोग हमें स्वच्छता, सादगी और प्राकृतिक चिकित्सा की ओर लौटने का संदेश देता है। हमारे हर ब्रत व त्योहार के पीछे बैज्ञानिक तथ्य छिपे है।यह सब आयुर्वेद का खजाना समेटे हुए है।

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