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अपनों को निपटाकर स्वयंभू सम्राट बनने की तैयारी?
- दैनिक लोक भारती
- 04 Jul, 2026
नीरज मिश्र।
पीलीभीत चार जुलाई। जनपद की राजनीति इन दिनों किसी पॉलिटिकल फिल्म से कम नजर नहीं आ रही। यहां हीरो बनने की जल्दबाजी में एक बड़े नेताजी खुद ही अपनी स्क्रिप्ट के विलेन बनते जा रहे हैं।
आगामी विधानसभा चुनाव की आहट क्या सुनाई दी, नेताजी को अचानक जनता, विकास, भ्रष्टाचार, नैतिकता और संगठन, सबकी याद एक साथ सताने लगी। लिहाजा जो जनप्रतिनिधि कल तक नेताजी के साथ साथ मंच साझा कर भाषणबाजी करते थे, आज वही नेताजी के राजनीतिक ज्ञान के शिकार हो रहे हैं।
अब स्थिति ऐसी हो चुकी है कि नेताजी विपक्ष से कम और अपनी ही पार्टी के लोगों से ज्यादा लड़ते दिखाई दे रहे हैं। कभी लेटर पैड पर शिकायतें, कभी सोशल मीडिया पर कटाक्ष, कभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के जरिए राजनीतिक माहौल का निर्माण और कभी प्रशासनिक गलियारों में दबाव, यह सब मिलाकर ऐसा लग रहा है कि मानो जिले में चुनाव की तैयारी नहीं, बल्कि अपनों को निपटाओ अभियान चलाया जा रहा हो।
महिला जनप्रतिनिधियों पर सियासी निशाना, फिर नैतिकता का भाषण!
चर्चा इस बात की है कि हाल के दिनों में जिले की महिला जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध जिस तरह माहौल तैयार किया गया, उसने नेताजी की राजनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए। आरोप है कि दल-विरोधी तत्वों और कुछ तथाकथित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को आगे कर अपने ही संगठन के लोगों की छवि धूमिल करने का खेल खेला गया।
लेकिन राजनीति में हर पटकथा सफल नहीं होती। एक महिला नगर पंचायत अध्यक्ष ने हजारों समर्थकों के साथ सड़क पर उतरकर ऐसा जवाब दिया कि नेताजी के रणनीतिकारों के पसीने छूट गए। सत्ता और प्रशासनिक रसूख के दम पर दबाव बनाने की कोशिशें उस दिन बैकफुट पर जाती दिखीं।
अब चर्चा है कि पहला मोर्चा ठंडा पड़ते ही नेताजी ने दूसरी महिला जनप्रतिनिधि को निशाने पर लेकर नया युद्ध छेड़ दिया है। योजनाओं में कमियां ढूंढना, आरोपों का धुआं उड़ाना और जाति धर्म के नाम पर माहौल गरम रखना शायद उनकी चुनावी रणनीति का नया हिस्सा बन चुका है।
चार साल खामोशी, अब गली गली चाय पर चर्चा!
जिले की जनता भी खूब समझदार है। लोग पूछ रहे हैं कि जो नेताजी चार साल तक एसी कमरों और बड़े काफिलों में व्यस्त थे, उन्हें अचानक अब गरीब, किसान और टूटी सड़क क्यों दिखाई देने लगी? इन दिनों नेताजी का पूरा फोकस फोटो राजनीति पर नजर आ रहा है। कहीं सड़क किनारे चाय, कहीं अस्पताल का निरीक्षण, कहीं जनता दरबार। नेताजी के हर कार्यक्रम के बाद सोशल मीडिया पर लंबा चौड़ा कैप्शन पोस्ट किया जाता है।
मियां मिट्ठू मॉडल पर चल रही राजनीति!
इतना ही नहीं, जिले की तमाम विकास योजनाओं का श्रेय भी खुद लेने की होड़ मची हुई है। यही वजह है कि मझोला में बंद पड़ी शुगर मिल से लेकर छोटे-बड़े विकास कार्यों तक में नेताजी खुद को जिले का अकेला मसीहा साबित करने में जुटे हुए हैं।
सूत्र बताते हैं कि नेताजी ने अपनी वाहवाही के लिए सोशल मीडिया पर प्रशंसा उद्योग खड़ा कर रखा है। कुछ इन्फ्लुएंसर्स सुबह उठते ही नेताजी की पोस्ट शेयर करते हैं, दोपहर में विरोधियों को कोसते हैं और रात तक जिले को स्वर्ग घोषित कर देते हैं। जनता भी समझ रही है कि अगर जमीन पर सच में विकास हुआ होता, तो नेताजी को हर तीसरे घंटे खुद की प्रशंसा पोस्ट करवाने की जरूरत नहीं पड़ती।
नेताजी का हिसाब अब ईवीएम करेगी!
बीते वर्षों में सत्ता की ताकत और प्रशासनिक दबाव का इस्तेमाल कर इलाके में डर का माहौल बनाने के आरोप भी लगातार उठते रहे हैं। भारी-भरकम काफिले, रसूख का प्रदर्शन और विरोधियों को किनारे लगाने की राजनीति अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो आने वाला चुनाव विपक्ष बनाम सत्ता से ज्यादा संगठन बनाम स्वयंभू नेतृत्व की लड़ाई बन सकता है।
सत्ता के नशे में खुद को अजेय मान बैठे नेताजी शायद यह भूल रहे हैं कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता करती है। और जनता जब चुप रहती है, तब वह सब कुछ साफ साफ देख रही होती है। इस बार के चुनाव में सोशल मीडिया का शोर बड़ा होगा या जनता के वोट की चोट! अब इसका जवाब आने वाला चुनाव ही देगा।
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