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डिजिटल युग ने छीना बचपन, स्मार्ट फोन के जाल में फंसी भावी पीढ़ी

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बांगरमऊ-उन्नाव। डिजिटल क्रांति के इस युग में स्मार्टफोन जहाँ ज्ञान का साधन बना है, वहीं दूसरी ओर यह नई पीढ़ी के लिए एक गंभीर समस्या का रूप लेता जा रहा है। स्थानीय अभिभावकों और शिक्षकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बच्चों के व्यवहार में भारी बदलाव आया है। पहले जो बच्चे अपनी पढ़ाई और खेलकूद में व्यस्त रहते थे, अब वे घंटो मोबाइल स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। नगर के एक प्रतिष्ठित विद्यालय के शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऑनलाइन क्लास की मजबूरी से शुरू हुई यह आदत अब लत बन चुकी है। बच्चे अब होमवर्क करने के बजाय रील्स, गेमिंग और सोशल मीडिया के जाल में फंस रहे हैं जिससे उनकी एकाग्रता में भारी कमी आई है।
एक अभिभावक का कहना है कि मोबाइल ने बच्चों को घर के अंदर ही कैद कर दिया है। पहले बच्चे शाम होते ही मैदान में नजर आते थे, अब वे केवल कमरे में बैठकर मोबाइल की रोशनी में खोए रहते हैं, न उन्हें शारीरिक खेल की चिंता है और न ही आने वाली परीक्षाओं की। चिकित्सकों का मानना है कि इस लत के केवल शैक्षिक ही नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। जैसे कम उम्र में ही चश्मा लगना। देररात तक मोबाइल के इस्तेमाल से अनिद्रा की समस्या। मोबाइल छीनने पर बच्चों में आक्रामकता और स्वभाव में बदलाव आना। विशेषज्ञों का सुझाव है कि अभिभावकों को अब अधिक सक्रिय होने की जरूरत है। बच्चों के लिए मोबाइल उपयोग का समय निर्धारित करें। बच्चों के साथ संवाद बढ़ाएं और उन्हें घर के कामों या अन्य शौक में शामिल करें। घर के बड़े स्वयं भी मोबाइल का सीमित उपयोग करें ताकि बच्चे आपसे प्रेरणा लें। जागरूक समाज अब इस बात को समझ रहा है कि यदि समय रहते बच्चों को इस डिजिटल चंगुल से बाहर नहीं निकाला गया तो भविष्य में इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं। प्रशासन और सामाजिक संगठनों को भी चाहिए कि वे इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाएं।

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