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37 लाख के सामान के लिए टेंडर क्यों नहीं करा रहा लविवि?, हॉस्टल्स के डेढ़ सौ कमरों के लिए आने हैं लाखों के फर्नीचर
- दैनिक लोक भारती
- 13 Aug, 2026
एक कमरे का 25,000 का पड़ रहा है कुल सामान ,करीब 37 लाख का है काम, लेकिन एल-वन पर हो रहा ठेकेदार का चुनाव
कमीशनखोरी पर आसिम के लालबाग स्थित के.सी.फर्नीचर्स से सामान खरीदने की तैयारी
गिरीश तिवारी
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के हॉस्टल में फर्नीचर की कमी है और जब तक फर्नीचर नहीं आ जाते, तब तक छात्र भी भला कैसे वहां रहेंगे? इसके लिए डेढ़ सौ कमरों में 25,000 रूपए प्रति कमरे के सामान की दर के हिसाब से फर्नीचर खरीदे जाने हैं। बताया जा रहा है कि करीब 37 लाख पचास हजार रुपए का फर्नीचर टेंडर ना करा करके सीधे एल-वन के हिसाब से अपने चहेते ठेकेदार आसिम की फर्म के.सी.फर्नीचर्स का चुनाव किया जा रहा है।
ईमानदारी की बड़ी-बड़ी बातें कहना अलग बात है और पैसे का सही ढंग से खर्च और सदुपयोग एक अलग बात है। लखनऊ विश्वविद्यालय के हॉस्टल में छात्रों के अलॉटमेंट को लेकर पहले ही काफी देर हो चुकी है, यही नहीं इसको लेकर कुलाधिपति/राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल भी लविवि को दीक्षांत समारोह में फटकार लगा चुकी है।
किसी भी यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में मैंम जहां भी जा रही है, वहां पर छात्रों की सुविधाओं को वह बारीकी से निरीक्षण अपनी टीम के द्वारा करवाती हैं और उसी की रिपोर्ट के आधार पर वह हर कुलपति की जबरदस्त ढंग से क्लास लेती है और इसकी सराहना पूरे प्रदेश भर के छात्र कर रहे हैं।
बहरहाल एक तरफ छात्रों के लिए हॉस्टल एलॉटमेंट की प्रक्रिया शुरू हुई तो दूसरी तरफ डेढ़ सौ कमरों में फर्नीचर के रूप में लोहे के एंगल में लकड़ी के पटरे का लगा हुआ मजबूत बेड, एक अलमारी, एक सेट कुर्सी-मेज इत्यादि के हिसाब से करीब 25,000 तय किया गया है।
पहले इसे ब्रांडेड कंपनी के माध्यम से खरीदने की बात हुई तो बड़ी ब्रांडेड कंपनियों के रेट लिए गए, इसके बाद पता चला कि साहब यह तो 60-70 हजार रुपए का हो पाएगा। इसके बाद प्रशासनिक भवन में बैठे आका ने सुझाया कि ब्रांडेड नहीं, लेकिन मजबूत सामान खरीदने की व्यवस्था की जाए। लेकिन मजबूत कमीशन की व्यवस्था शुरू हो गई। इसके बाद 25,000 रूपये के हिसाब से डेढ़ सौ कमरों की व्यवस्था बनी और 37 लाख रुपए से अधिक का बजट फर्नीचर पर व्यय होने जा रहा है, लेकिन इसके लिए एक चहेते दुकानदार आसिम के लालबाग स्थित के.सी.फर्नीचर का चुनाव किया गया है और ठेका उसको ही देने की तैयारी शुरू हो गई है।
सवाल यह उठता है कि जब ठेका 37 लाख रुपए का है तो टेंडर प्रक्रिया से क्यों नहीं खरीदारी की जा रही है। और यदि टेंडर प्रक्रिया में जाने के लिए समय नहीं है, तो पिछले एक महीने से जानबूझकर देरी क्यों की जा रही थी? और कुलपति से परमिशन लेकर शॉर्ट टर्म टेंडर यानी एक सप्ताह के लिए भी किया जा सकता है।
माना जा रहा है कि हॉस्टल और छात्रों का मामला है तो इसमें हॉस्टल के चीफ प्रोवोस्ट डॉक्टर आशीष अवस्थी और डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो.अमिता कनौजिया के साथ एडिशनल अधिकारियों की तो भागीदारी होगी ही होगी। इस मामले में ठेकेदार का नाम ओपन होने के बाद से प्रशासनिक भवन से लेकर लखनऊ विश्वविद्यालय में बंदरबांट की चर्चाओं से बाजार गर्म है।
इस बारे में जब विश्वविद्यालय के आईपीपीआर निदेशक मुकुल श्रीवास्तव से पूछा गया तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की, जबकि अन्य अधिकारियों ने मामले से पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह है कि प्रदेश सरकार के नियमों के हिसाब से टेंडर करिए और यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर डाल दीजिए, अच्छे से अच्छे ठेकेदार आएंगे और उस हिसाब से पैसे का सदुपयोग किया जाना चाहिए लेकिन हो कुछ और रहा है।
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