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बेटियों ने निभाया बेटे का फर्ज, मां की अर्थी को सातों ने दिया कंधा
- दैनिक लोक भारती
- 05 Sep, 2026
दिबियापुर में छोटी बेटी सोनी ने दी मां कृष्ण देवी को मुखाग्नि, बोली- मां ने हमें बेटों की तरह पाला, अंतिम विदाई में किसी और का सहारा क्यों लें
रोहित अवस्थी
दिबियापुर औरैया। समाज में बेटियों को लेकर चली आ रही रूढ़िवादी सोच को पीछे छोड़ते हुए दिबियापुर में सात बहनों ने अपनी मां की अंतिम विदाई में मिसाल कायम की। शनिवार को मां कृष्ण देवी (59) के निधन के बाद सातों बेटियों ने बारी-बारी से उनकी अर्थी को कंधा दिया। इसके बाद मुक्तिधाम में सबसे छोटी बेटी सोनी सविता (25) ने पूरे रीति-रिवाज के साथ मां को मुखाग्नि दी। बेटियों के इस फैसले की क्षेत्र में खूब चर्चा रही।
दुर्गानगर निवासी कृष्ण देवी के पति रामकिशोर सविता सेना में थे। सेवानिवृत्ति के कुछ वर्ष बाद उनका निधन हो गया था। दंपती के कोई बेटा नहीं था। पति की मृत्यु के समय सामाजिक परंपराओं के चलते उनके अंतिम संस्कार में परिवार के भतीजे की मदद ली गई थी।
पति के निधन के बाद कृष्ण देवी ने अकेले संघर्ष करते हुए अपनी सात बेटियों का पालन-पोषण किया। बेटियों के लिए मां ही उनका सहारा और मार्गदर्शक थीं। परिजनों के अनुसार कृष्ण देवी काफी समय से बीमार चल रही थीं। सभी बेटियां मिलकर उनका इलाज और घर का खर्च संभाल रही थीं। सबसे छोटी बेटी सोनी मां की देखभाल के लिए मायके में रह रही थी। उसके पति आगरा में निजी नौकरी करते हैं।
मुखाग्नि को लेकर हुई चर्चा, फिर बेटी ने लिया फैसला
शनिवार सुबह कृष्ण देवी का निधन हो गया। अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान मुखाग्नि देने को लेकर परिवार और रिश्तेदारों में चर्चा शुरू हुई। इसी बीच छोटी बेटी सोनी ने कहा कि जब मां ने सभी बेटियों को बेटों की तरह पाला है और कभी बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी, तो अंतिम विदाई के लिए किसी पुरुष रिश्तेदार का सहारा क्यों लिया जाए।
सोनी के फैसले का उसकी छहों बहनों ने समर्थन किया। इसके बाद सातों बहनों ने मां की अर्थी को कंधा दिया। अंतिम यात्रा दिबियापुर के मुक्तिधाम पहुंची, जहां सोनी ने विधि-विधान के साथ मां की चिता को मुखाग्नि दी। इस भावुक दृश्य को देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।
बेटियों के इस कदम ने समाज को यह संदेश दिया कि माता-पिता के प्रति प्रेम, सेवा और जिम्मेदारी बेटा-बेटी के भेद से ऊपर है। मां ने जीवनभर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया और बेटियों ने भी अंतिम समय में अपना फर्ज निभाकर मां को अंतिम विदाई दी।
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