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अस्पताल चमचमा रहा, आईसीयू पर ताला: बदायूं में 'राम भरोसे' वेंटिलेटर, तड़पते मरीजों को रेफर कर पल्ला झाड़ रहा प्रशासन
- दैनिक लोक भारती
- 14 Sep, 2026
परविन्दर प्रताप सिंह
बदायूं।सूबे की सरकार भले ही स्वास्थ्य सेवाओं को 'हाईटेक' बनाने के लंबे-चौड़े दावे करे, लेकिन जिला अस्पताल की जमीनी हकीकत इन दावों की धज्जियां उड़ा रही है। आलम यह है कि पिछले तीन दिनों से जिला अस्पताल का आईसीयू (गहन चिकित्सा इकाई) वार्ड सफेद हाथी बनकर रह गया है और उसके मुख्य द्वार पर ताला लटक रहा है। वजह? कोई बड़ा तकनीकी फॉल्ट नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और स्टाफ की खींचतान!
कर्मचारियों को सीएमओ कार्यालय से संबद्ध करने और फिर बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के हटा देने के इस 'अनाड़ी खेल' ने पूरे आईसीयू संचालन को ठप कर दिया है। नतीजतन, वेंटिलेटर और आधुनिक लाइफ-सपोर्ट सिस्टम धूल फांक रहे हैं और सांसों के लिए जूझते मरीज अस्पताल के गलियारों में तड़पने को मजबूर हैं।
जिंदगी पर भारी 'रेफरल' का खेल
सांस की गंभीर बीमारी, हार्ट अटैक या हादसों का शिकार होकर अस्पताल पहुंचने वाले अति-गंभीर मरीजों के लिए यह आईसीयू किसी वरदान से कम नहीं था। लेकिन ताला लटकने के बाद अब डॉक्टरों का काम सिर्फ इतना रह गया है कि पर्चा बनाओ और मरीज को 'हायर सेंटर' के लिए टरका दो।
तीमारदारों की जेब पर डाका: अचानक रेफर किए जाने से परिजनों को प्राइवेट एम्बुलेंस और महंगे अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
समय पर इलाज का जोखिम: बरेली या अलीगढ़ भागने के चक्कर में मरीज रास्ते में ही दम तोड़ने को मजबूर हैं।
सवालों के घेरे में व्यवस्था: जब करोड़ों की लागत से बना आईसीयू मौजूद है, तो महज 3-4 स्टाफ की तैनाती न कर पाना किस तरह की प्रशासनिक लाचारी है?
आश्वासन का वही घिसा-पिटा राग
अस्पताल में अपनों का इलाज कराने आए तीमारदारों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहा है। जब इस बदहाली पर अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) डॉ. सतीश नागर से बात की गई, तो उनका भी वही रटा-रटाया जवाब सामने आया— "आईसीयू जल्द शुरू कराया जाएगा, स्टाफ की व्यवस्था की जा रही है।"
सवाल यह उठता है कि जब तक यह 'व्यवस्था' कागजों से निकलकर जमीन पर आएगी, तब तक बेकसूर मरीजों की जान का हिसाब कौन देगा? क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
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