आज की ताजा खबर

शव 63 घंटे तक रहा सुरक्षित, कब्र बनाने में लगे तीन दिन, गांव में कौतूहल

top-news

कुछमुछ के तकिया निवासी जिलानी शाह कादिरी उर्फ नूजूर की मौत बनी चर्चा का विषय

फ्रीजर ना बर्फ...छप्पर के नीचे चद्दर से ढकी रखी रही मृत शरीर में नहीं हुआ कोई बदलाव

सुशील मिश्रा

सुल्तानपुर। आमतौर पर किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद यदि अंतिम संस्कार में कुछ घंटे की देरी हो जाए और परिजनों के आने का इंतजार करना पड़े तो शव को सुरक्षित रखने के लिए फ्रीजर, बर्फ या अन्य इंतजाम किए जाते हैं। वजह यह होती है कि सामान्य तापमान में शव से कुछ समय बाद दुर्गंध आने और शरीर में प्राकृतिक बदलाव शुरू होने की आशंका रहती है। लेकिन सुल्तानपुर जिले के भदैया ब्लॉक के कुछमुछ तकिया गांव में इससे अलग मामला चर्चा का विषय बना हुआ है।

शनिवार रात करीब 11 बजे 70 वर्षीय जिलानी शाह कादिरी उर्फ नूजूर का निधन हुआ। वह करीब पखवाड़े भर से बीमार चल रहे थे। मुंबई से कुछ परिजनों और साथियों के आने तथा अंतिम संस्कार के लिए पक्की कब्र तैयार करने में समय लगा। मंगलवार दोपहर करीब दो बजे, यानी निधन के करीब 63 घंटे बाद, उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। खास बात यह रही कि परिजनों के मुताबिक इस पूरे समय शव को न तो फ्रीजर में रखा गया और न ही बर्फ से ढका गया। करीब 63 घंटे तक खुले में छप्पर के नीचे चादर से ढके सामान्य वातावरण में रखे रहने के बावजूद शव में कोई खास बदलाव नहीं दिखाई दिया। न दुर्गंध आने की शिकायत हुई और न ही शरीर में अपेक्षित बदलाव नजर आया। शव के पास परिजन और नाते-रिश्तेदार लगातार मौजूद रहे। यह बात सामने आने के बाद आसपास के लोगों में भी कौतूहल पैदा हो गया।

कादरी सिलसिले से जुड़ी है मान्यता

मृतक के बेटे अंसार, शमशाद और इरफान हैं। बेटे अंसार के मुताबिक, कई लोगों ने शव को बर्फ या फ्रीजर में रखने की सलाह दी थी, लेकिन उनके पिता से जुड़े कादरी सिलसिले के लोगों का विश्वास था कि शव को इस तरह सुरक्षित रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कादरी सिलसिला दरअसल सूफी परंपरा का एक आध्यात्मिक सिलसिला है, जिसका संबंध महान सूफी संत हजरत शेख अब्दुल कादिर जिलानी से माना जाता है। सरल शब्दों में कहें तो यह पीर-मुरीद की आध्यात्मिक परंपरा है, जिसमें अनुयायी अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक से जुड़े रहते हैं। कादरी सिलसिले से जुड़े लोगों के बीच शव और अंतिम संस्कार को लेकर भी कुछ धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं प्रचलित हैं। परिजनों और सिलसिले से जुड़े लोगों का कहना है कि इसी आस्था के कारण शव को सामान्य स्थिति में रखा गया। उनका दावा है कि कितने भी समय तक शव रखने पर इसमें दुर्गंध नहीं आएगी। ग्रामीण इस घटना को इसी मान्यता, आस्था और कुदरत के करिश्मे से जोड़कर देख रहे हैं।


तीन दिन में तैयार हुई पक्की कब्र

शव के अंतिम संस्कार में देरी का एक कारण पक्की कब्र की तैयारी भी बताया गया। मृतक की निजी जमीन पर कब्र को विशेष तरीके से तैयार किया गया। बताया जाता है कि कब्र करीब 10 फीट गहरी खोदी गई। अंदर चारों तरफ करीब नौ इंच मोटी पक्की दीवारें बनाई गईं और नीचे फर्श भी पक्का किया गया। कब्र के सिर की तरफ अंदर एक विशेष ताखा बनाया गया है, जिसमें परिजनों के अनुसार सिजरा रखा जाएगा। वहीं दाहिनी तरफ दीवार में दूसरा ताखा बनाया गया है, जिसमें चिराग जलाने की बात बताई गई। ऊपर से मिट्टी डालने के लिए पत्थर की पटिया भी तैयार की गई। इस पूरी तैयारी में करीब तीन दिन लगने की बात कही जा रही है।

63 घंटे तक शव के पास बैठे रहे परिजन

शनिवार रात से मंगलवार दोपहर तक परिवार के लोग, रिश्तेदार और आसपास के लोग शव के पास मौजूद रहे। मुंबई से आने वाले साथियों और परिजनों के पहुंचने का इंतजार भी किया गया। मंगलवार को जौहर की नमाज के बाद करीब दो बजे उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

चिकित्सक ने कहा, 63 घंटे बाद भी बदलाव न होना सामान्य नहीं

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भदैयाँ के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आरपी सिंह का कहना है कि मृत्यु के बाद शरीर में प्राकृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। सामान्य परिस्थितियों में करीब 10 से 12 घंटे के बाद शव में बदलाव दिखाई देने लगते हैं और गर्मी के मौसम में समय बढ़ने के साथ दुर्गंध समेत अन्य परिवर्तन भी आने लगते हैं। हालांकि इसकी गति तापमान, वातावरण और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर कर सकती है। करीब 63 घंटे तक बिना फ्रीजर और बिना बर्फ के शव रखे जाने तथा इस दौरान दुर्गंध या अन्य स्पष्ट बदलाव नहीं आने की बात बताई जा रही है। सामान्य चिकित्सकीय अनुभव की दृष्टि से इतनी लंबी अवधि तक शव में कोई परिवर्तन न होना असामान्य जरूर है।

 

पेपर व डिजिटल मे विज्ञापन हेतु संपर्क करे

संपर्क सूत्र - +91 77549 54126

https://lokbharti.co.in/ad/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *