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आनंदपुरी जैन मंदिर में गूंजा उत्तम क्षमा धर्म का संदेश, श्रद्धालुओं ने की पूजा-अर्चना

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अभिषेक के बाद हुई शांति धारा, पंडित राकेश जी ने संगीत मय पूजन के साथ समझाया तत्त्वार्थ सूत्र

प्रवचन में कहा- क्रोध को छोड़कर आत्मा के स्वभाव में स्थिर होना ही क्षमा धर्म का मार्ग

अरविन्द पाण्डेय

कानपुर “उत्तम क्षमा धर्म” के संदेश के साथ आनंदपुरी जैन मंदिर में धार्मिक आयोजन हुआ। प्रातः काल से ही मंदिर में श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया। भक्तों ने भगवान के अभिषेक में भाग लिया और इसके बाद शांति धारा की धार्मिक क्रिया संपन्न हुई।

शांति धारा का सौभाग्य श्री अनुज सीमा जैन परिवार और अंजुल जैन को प्राप्त हुआ। इसके बाद आगरा से पधारे पंडित श्री राकेश जी ने संगीत मय पूजन कराया। उन्होंने जैन धर्म के महान ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन किया और उसके अर्थ को श्रद्धालुओं को सरल तरीके से समझाया।

दिनभर चले धार्मिक कार्यक्रम के बाद सायंकाल मंदिर परिसर में भक्ति का माहौल और भी उत्साहपूर्ण हो गया। संगीत के साथ भगवान की आरती की गई। इसके बाद आनंद यात्रा सेवा समिति की ओर से भक्ति मय धार्मिक अंताक्षरी का आयोजन कराया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ सहभागिता की।


आत्मा के स्वभाव में स्थिर होना ही क्षमा

पंडित राकेश जी ने उत्तम क्षमा धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि आत्मा की स्वाभाविक परिणति को ही क्षमा कहा गया है। उनके अनुसार अपनी आत्मा के स्वभाव में स्थिर हो जाना क्षमा है। प्रतिकूल परिस्थितियों या प्रतिकूल समाज मिलने पर भी मन की परिणति विकृत न हो, खेद और खिन्नता उत्पन्न न हो, यही क्षमा धर्म का भाव है।

उन्होंने कहा कि मानव जीवन में क्षमा धर्म का वही महत्व है, जो इस शरीर के लिए आत्मा का है। जिस प्रकार आत्मा के बिना मानव देह का कोई मूल्य नहीं, उसी प्रकार क्षमा के बिना आत्मा के स्वभाव की वास्तविक पहचान नहीं हो सकती। क्षमा आत्मा का स्वभाव है और धर्म में प्रवेश करने का पहला द्वार भी यही है।

पंडित जी ने कहा कि धर्म में प्रवेश की पहली शर्त क्रोध का त्याग है। क्रोध को क्षमा धर्म का विरोधी बताते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने भीतर मौजूद क्रोध रूपी विकार को दूर कर उसकी जगह क्षमा को प्रतिष्ठित करने का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि क्षमा बाहर से कहीं से आने वाली चीज नहीं है, बल्कि वह आत्मा में पहले से ही विद्यमान है। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य क्रोध को छोड़कर अपने भीतर मौजूद क्षमा के स्वभाव को पहचाने और उसे जीवन में अपनाए।

प्रवचन में कहा गया कि क्रोध अनेक अनर्थों की जड़ है। संसार में क्रोध के समान कोई पाप नहीं और क्षमा के समान कोई धर्म नहीं माना गया है। इसलिए मनुष्य को परिस्थितियां प्रतिकूल होने पर भी संयम बनाए रखते हुए क्षमा के मार्ग पर चलना चाहिए।

पूरे आयोजन के दौरान आनंदपुरी जैन मंदिर में भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना, आरती और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेकर उत्तम क्षमा धर्म का संदेश आत्मसात किया।

 

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