आज की ताजा खबर
विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना उनके उज्वल भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम-विनय जायसवाल
भीलमपुर में दबंगों के कब्जे से कब आजाद होगा खेल का मैदान?,रास्ते पर भी जमाया कब्जा, मौन खड़ा प्रशासन।
सपा के वरिष्ठ नेता जनसेवक पवन दूबे द्वारा श्रावण मास के अंतिम सोमवार को किया गया महा भंडारे का आयोजन
जिलाधिकारी द्वारा श्रम विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों की प्रगति की समीक्षा हुई
उमेश की मौत पर भड़का आक्रोश, शव रखकर निगोही रोड पर लगाया जाम, प्रदर्शनकारियों ने पुलिस से की अभद्रता
डॉ. राजीव कुमार पाठक फर्रुखाबाद ताइक्वांडो एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष मनोनीत, खिलाड़ियों में खुशी की लहर
नेबुआ नौरंगिया थाने की सख्त कार्रवाई में पुलिस टीम से बदसलूकी व वर्दी फाड़ने वाले तीन आरोपी गिरफ्तार
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्याय की जयंती पर देशभक्ति से गूंजा रामराज इंटर कॉलेज
- होम
-
राज्य
- राजस्थान
- बिहार
- दिल्ली
- उत्तराखंड
-
उत्तर प्रदेश
- लखनऊ
- कानपुर-नगर
- बुंदेलखंड
- सीतापुर
- सुल्तानपुर
- रायबरेली
- बरेली
- पीलीभीत
- अमेठी
- बाराबंकी
- हरदोई
- कुशीनगर
- प्रयागराज
- अयोध्या
- गोरखपुर
- गोंडा
- बहराइच
- कौशांबी
- लखीमपुर
- शाहजहांपुर
- उन्नाव
- फतेहपुर
- कानपुर-देहात
- औरैया
- इटावा
- मैनपुरी
- फर्रुखाबाद
- कन्नौज
- आगरा
- फिरोजाबाद
- अलीगढ़
- एटा
- मथुरा
- गाजियाबाद
- उरई
- हमीरपुर
- चित्रकूट
- बांदा
- महोबा
- झांसी
- ललितपुर
- मध्य प्रदेश
- मनोरंजन
- बिजनेस
- करियर
- राशिफल
- लाइफस्टाइल
- खेल
- देश
- राजनीति
- दुनिया
कूड़े के ढेर में भविष्य तलाश रहे नौनिहाल, जिम्मेदार कौन?
- दैनिक लोक भारती
- 22 Sep, 2026
हेमन्त कुमार श्रीवास्तव/ओम मिश्रा
श्रावस्ती। जिन नौनिहालों के हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए, उन्हीं हाथों में कबाड़ से भरी बोरियां नजर आ रही हैं। जिस उम्र में बच्चों को विद्यालय जाकर पढ़ाई करने, खेलकूद और अपने सपनों को आकार देने की जरूरत है, उस उम्र में कई बच्चे परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ उठाते दिखाई दे रहे हैं। सुबह के समय जब दूसरे बच्चे स्कूल की ओर कदम बढ़ाते हैं, वहीं कुछ नौनिहाल कूड़े और कबाड़ के ढेर में अपने भविष्य की तलाश करते नजर आते हैं।
यह तस्वीर केवल गरीबी की कहानी नहीं है, बल्कि बाल श्रम और बच्चों की शिक्षा से जुड़े सवालों को भी सामने लाती है। शासन की ओर से बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने तथा बाल श्रम रोकने के लिए तमाम योजनाएं और अभियान संचालित किए जा रहे हैं। इसके बावजूद यदि बच्चे विद्यालय जाने के बजाय कबाड़ बीनने के लिए मजबूर हैं तो निश्चित रूप से व्यवस्था की निगरानी और जिम्मेदारी पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
किताबों की जगह हाथों में कबाड़ की बोरी
कूड़े के ढेर में कबाड़ तलाशते बच्चों की उम्र ऐसी होती है, जब उन्हें अक्षर ज्ञान से लेकर अपने भविष्य की नींव मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन आर्थिक मजबूरी अथवा पारिवारिक परिस्थितियों के कारण कुछ बच्चे कम उम्र में ही काम करने लगते हैं। हाथों में किताबों की जगह बोरी और आंखों में भविष्य के सपनों की जगह रोजी-रोटी की चिंता दिखाई देती है।
सवाल यह है कि आखिर इन बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या केवल माता-पिता की जिम्मेदारी मानकर प्रशासनिक व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है? यदि कोई बच्चा लगातार विद्यालय से बाहर है और काम करता दिखाई दे रहा है तो उसकी स्थिति का पता लगाने तथा उसे शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए संबंधित विभागों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
हर सप्ताह होती है समीक्षा, फिर भी सवाल बरकरार
एक तरफ जिलाधिकारी की ओर से जनपद को बाल श्रम मुक्त बनाने के लिए बाल श्रम उन्मूलन अभियान की नियमित समीक्षा की जाती है। अधिकारियों और संबंधित विभागों को बच्चों के भविष्य को लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाते हैं तथा अपने दायित्वों के प्रति सचेत किया जाता है। दूसरी ओर जमीन पर दिखाई देने वाली तस्वीर इन प्रयासों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती है।
यदि अभियान के बावजूद बच्चे सार्वजनिक स्थानों, बाजारों और कूड़े के ढेरों में कबाड़ बीनते दिखाई दे रहे हैं तो संबंधित विभागों को इसकी गंभीरता से पड़ताल करनी होगी। केवल बैठकों और समीक्षा तक अभियान सीमित न रहकर उसका असर धरातल पर भी दिखाई देना जरूरी है।
सूचना देने में भी लोगों को झेलना पड़ता है झंझट
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार लोग बाल श्रम से जुड़ी जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना चाहते हैं। लेकिन जब शिकायत या सूचना देने के बाद जिम्मेदारी एक-दूसरे विभाग पर डालने जैसी स्थिति सामने आती है तो आम नागरिक भी इस प्रक्रिया में पड़ने से बचने लगते हैं।
लोगों का सवाल है कि यदि किसी होटल, दुकान, कबाड़ स्थल या अन्य स्थान पर नाबालिग से काम कराया जा रहा है तो उसकी जांच और आवश्यक कार्रवाई के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? शिकायतकर्ता को विभागों के बीच भटकने के बजाय ऐसी व्यवस्था मिलनी चाहिए, जहां उसकी सूचना पर संबंधित अधिकारी स्वयं संज्ञान लेकर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाएं।
जिम्मेदारी केवल परिवार की या व्यवस्था की भी?
गरीबी और पारिवारिक मजबूरी बाल श्रम के प्रमुख कारणों में हो सकते हैं, लेकिन बच्चों के अधिकारों की रक्षा केवल परिवार की जिम्मेदारी मान लेना पर्याप्त नहीं है। समाज, प्रशासन, संबंधित विभाग, विद्यालय और स्थानीय समुदाय—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।
यदि किसी परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि बच्चा पढ़ाई छोड़कर काम करने को मजबूर है तो ऐसे परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने की जरूरत है। वहीं यदि कोई बच्चा किसी प्रतिष्ठान या अन्य स्थान पर श्रम करता पाया जाता है तो नियमानुसार संबंधित अधिकारियों द्वारा जांच और कार्रवाई किया जाना भी आवश्यक है।
कब आएगी बोरियों की जगह किताब?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक जनपद में नौनिहाल कूड़े और कबाड़ के ढेर में अपना भविष्य तलाशते रहेंगे? कब उनके हाथों से कबाड़ की बोरियां हटकर किताबें और कॉपियां आएंगी? कब उनके चेहरे पर रोजी-रोटी की चिंता की जगह शिक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीद दिखाई देगी?
बाल श्रम उन्मूलन अभियान की सफलता केवल बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि कितने बच्चों को श्रम से बाहर निकालकर विद्यालय तक पहुंचाया गया। जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग नियमित रूप से ऐसे बच्चों को चिन्हित करें, उनके परिवारों की परिस्थितियों को समझें और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रभावी कदम उठाएं।
अब सवाल केवल यह नहीं कि ये बच्चे कूड़े के ढेर में क्यों हैं, बल्कि सवाल यह भी है कि इन्हें वहां से निकालकर स्कूल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
पेपर व डिजिटल मे विज्ञापन हेतु संपर्क करे
संपर्क सूत्र - +91 77549 54126
Leave a Reply
Your email address will not be published. Required fields are marked *

ई_पेपर







