आज की ताजा खबर

मुख्यमंत्री से बैर नहीं, जनप्रतिनिधियों की खैर नहीं! फर्रुखाबाद में बदलते जनमत के संकेत

top-news

नौ साल के इंतजार के बाद जनता के सब्र का बांध टूटने की चर्चा, विकास के वादों पर उठ रहे सवाल—अब चेहरों के बजाय काम के आधार पर टिकट की मांग,

लक्ष्मी शरण सिंह राठौड़

फर्रुखाबाद  l “मुख्यमंत्री से बैर नहीं, जनप्रतिनिधियों तुम्हारी खैर नहीं”—इन दिनों फर्रुखाबाद की सियासी गलियों में सुनाई देने वाली यह चर्चा महज राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि बदलते जनमत का संकेत बनती दिखाई दे रही है। जनपद की चाय की दुकानों से लेकर गांव की चौपालों और कस्बों की बैठकों तक एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है कि करीब नौ वर्षों से सत्ता के साथ खड़े रहने के बावजूद जिले के विकास की तस्वीर आखिर उस स्तर तक क्यों नहीं पहुंच सकी, जिसकी उम्मीद जनता ने जनप्रतिनिधियों से की थी।

फर्रुखाबाद में चार विधायक, एक विधान परिषद सदस्य, एक सांसद और जिला पंचायत अध्यक्ष सहित सत्ता पक्ष से जुड़े जनप्रतिनिधियों की मजबूत राजनीतिक मौजूदगी है। ऐसे में आम मतदाता यह सवाल पूछने लगा है कि जब केंद्र और प्रदेश में एक ही दल की सरकार है तथा जिले में भी सत्ता पक्ष का प्रभाव है, तो फिर विकास की गति अपेक्षित क्यों नहीं दिखाई दे रही?

जनता ने वर्षों तक उम्मीदों की नाव पर सवार होकर विकास की बैतरणी पार करने का इंतजार किया। सड़क, जलभराव, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, बाढ़ और ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे। समय बीतता गया और चुनाव दर चुनाव जनता से विकास के नए वादे किए जाते रहे। अब यही वादे राजनीतिक बहस का केंद्र बनते जा रहे हैं।

 वादों की लंबी फेहरिस्त, अब हिसाब मांग रही जनता

 राजनीतिक दल चुनाव के समय जनता के बीच पहुंचते हैं। बड़े-बड़े वादे होते हैं, विकास का खाका खींचा जाता है और आने वाले वर्षों में तस्वीर बदलने का भरोसा दिया जाता है। लेकिन मतदाता अब केवल भाषण सुनने के बजाय यह जानना चाहता है कि पिछले वर्षों में वास्तव में कितना काम हुआ।

जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि अब केवल पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्याशी का व्यक्तिगत आचरण, उसकी शिक्षा, जनता से संवाद, उपलब्धता और विकास का स्पष्ट विजन भी मतदाता के निर्णय को प्रभावित करेगा।

यही वजह है कि आने वाले चुनावों को लेकर अभी से राजनीतिक चर्चाएं तेज होने लगी हैं। कई लोग यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि लगातार लंबे समय तक सत्ता का हिस्सा रहे जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल का मूल्यांकन अब चुनावी कसौटी पर किया जाएगा।

जनता के पास सबसे बड़ा हथियार—वोट

लोकतंत्र में जनता के पास सत्ता बदलने का सबसे बड़ा अधिकार उसका मत है। यही मत किसी सामान्य व्यक्ति को ऊंची कुर्सी तक पहुंचाता है और यही मत पांच वर्ष बाद उसके काम का हिसाब भी मांगता है।

फर्रुखाबाद में भी राजनीतिक चर्चाओं के बीच यह संदेश उभर रहा है कि यदि जनता को लगता है कि उसके मुद्दों की अनदेखी हुई है तो वह मतदान के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर कर सकती है। मतदाताओं की यह सोच आने वाले चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकती है।

हालांकि अभी चुनाव में समय है, लेकिन जनचर्चा का रुख राजनीतिक दलों के लिए संकेत जरूर माना जा सकता है कि मतदाता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि काम का परिणाम देखना चाहता है।

योगी के नेतृत्व पर भरोसा, स्थानीय चेहरों पर सवाल

दिलचस्प बात यह है कि जनचर्चा में प्रदेश सरकार के नेतृत्व को लेकर मतदाताओं की राय अलग दिखाई देती है। सरकार की अगुवाई के सवाल पर बड़ी संख्या में लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व के प्रति भरोसा जताते हैं, लेकिन स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लेकर उनकी नाराजगी अलग विषय के रूप में सामने आती है।

यानी मतदाता सरकार और स्थानीय प्रतिनिधि के बीच अंतर करके मूल्यांकन करने की बात कर रहा है। यही राजनीतिक समीकरण सत्ताधारी दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।

जनता के बीच यह मांग भी सुनाई दे रही है कि यदि पार्टी आगामी चुनाव में ऐसे नए चेहरों को अवसर देती है जो शिक्षित हों, ईमानदार छवि रखते हों, जनता के बीच उपलब्ध रहते हों, जनसंवाद में विश्वास करते हों और विकास का स्पष्ट विजन रखते हों, तो पार्टी के प्रति मतदाताओं का भरोसा कायम रह सकता है।

टिकट का फैसला बना सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल

आने वाले समय में सत्ताधारी दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि सही प्रत्याशी का चयन भी होगी। स्थानीय स्तर पर उठ रही चर्चाओं को यदि राजनीतिक संकेत माना जाए तो मतदाता अब यह चाहता है कि टिकट वितरण में केवल राजनीतिक समीकरण या पुराने चेहरों को प्राथमिकता न मिले, बल्कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और पिछले कार्यों का भी मूल्यांकन हो।

यदि पुराने चेहरों को ही दोबारा मैदान में उतारा गया तो असंतोष मतदान के समय कितना प्रभाव डालेगा, यह भविष्य बताएगा। वहीं नए और जनसंवाद वाले चेहरों को मौका मिलने पर पार्टी के पक्ष में बनी सरकार विरोधी अथवा स्थानीय नाराजगी कितनी बदलती है, यह भी देखने वाली बात होगी।

जनता का संदेश साफ—कुर्सी नहीं, काम चाहिए

फर्रुखाबाद की मौजूदा राजनीतिक चर्चा का सार यही है कि जनता अब केवल कुर्सी पर बैठे प्रतिनिधि को नहीं देखना चाहती, बल्कि उस कुर्सी की जिम्मेदारी निभाने वाला प्रतिनिधि चाहती है। मतदाता विकास के नाम पर किए गए वादों का हिसाब चाहता है और यह भी चाहता है कि उसका प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद भी उसके बीच दिखाई दे।

राजनीति में पांच वर्ष लंबा समय होता है। इस दौरान जनता के सामने काम करने के पर्याप्त अवसर होते हैं। इसलिए चुनाव के समय किए गए वादों से ज्यादा महत्व अब उन कार्यों का होगा जो जमीन पर दिखाई देंगे।

फर्रुखाबाद की सियासत में यदि वर्तमान जनचर्चा आने वाले महीनों में भी कायम रहती है तो चुनावी मुकाबला केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि पुराने चेहरे बनाम नए विकल्प, वादे बनाम काम और राजनीतिक पहचान बनाम व्यक्तिगत स्वीकार्यता के बीच भी दिखाई दे सकता है।

आखिर लोकतंत्र में अंतिम फैसला किसी नेता, संगठन या समीकरण का नहीं, बल्कि जनता की उंगली पर लगी स्याही का होता है। जनता जिसे वर्षों तक सिर आंखों पर बैठाती है, उसे सत्ता तक पहुंचाने की ताकत भी उसी के पास होती है और काम पसंद न आने पर सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने का अधिकार भी उसी के पास रहता है।

फर्रुखाबाद का बदलता जनमत फिलहाल एक सवाल छोड़ रहा है—अगले चुनाव में जनता पार्टी का चेहरा चुनेगी या अपना प्रतिनिधि? इसका जवाब आने वाला चुनाव ही देगा।

 

पेपर व डिजिटल मे विज्ञापन हेतु संपर्क करे

संपर्क सूत्र - +91 77549 54126

https://lokbharti.co.in/ad/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *