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फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय, डॉक्टर की गैरहाजिरी से मरीज परेशान!

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सिंगापट्टी के बांसी मेला स्थित अस्पताल में लोकभारती टीम के निरीक्षण के दौरान नहीं मिलीं महिला चिकित्सक विशाखा राय,

जर्जर भवन और टूटी कुर्सियां-मेज बयां कर रहीं बदहाली की कहानी

मोहम्मद नईम  

कुशीनगर। जिले के विशुनपुरा विकासखंड की ग्राम पंचायत सिंगापट्टी स्थित राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय बांसी मेला की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यहां इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले मरीजों को चिकित्सक की अनुपस्थिति के कारण कथित तौर पर बिना उपचार के ही लौटना पड़ रहा है। अस्पताल में गंदगी, जर्जर भवन और टूटी-फूटी कुर्सियों व मेज की स्थिति स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की तस्वीर पेश कर रही है। हैरानी की बात यह है कि सोमवार 12 अक्टूबर 26 को लगभग 12 बजे लोकभारती की टीम के मौके पर पहुंचने के दौरान महिला चिकित्सक मौजूद नहीं मिलीं। अस्पताल में केवल फार्मासिस्ट धर्मेंद्र कुशवाहा और चतुर्थ श्रेणी की महिला कर्मचारी सोनी कुशवाहा उपस्थित मिलीं।

ग्रामीणों की शिकायत है कि अस्पताल में तैनात महिला चिकित्सक डॉ. विशाखा राय नियमित रूप से ड्यूटी पर नहीं आती हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, उनकी उपस्थिति महीने में कभी-कभार ही दिखाई देती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चिकित्सालय में डॉक्टर ही उपलब्ध नहीं हों, तो मरीजों को समय पर उपचार कैसे मिलेगा? हालांकि, चिकित्सक की वास्तविक उपस्थिति और अनुपस्थिति की स्थिति की पुष्टि विभागीय अभिलेखों एवं ड्यूटी रजिस्टर की जांच से ही हो सकेगी।


चार दिन की तैनाती, फिर भी चिकित्सक की अनुपस्थिति पर सवाल

जानकारी के अनुसार, राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय बांसी मेला में महिला चिकित्सक डॉ. विशाखा राय, फार्मासिस्ट धर्मेंद्र कुशवाहा और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सोनी कुशवाहा की तैनाती है। बताया जाता है कि डॉ. विशाखा राय की बृहस्पतिवार और शनिवार को जिला अस्पताल में ड्यूटी रहती है, जबकि सोमवार, मंगलवार, बुधवार और शुक्रवार को बांसी मेला स्थित चिकित्सालय में उनकी तैनाती निर्धारित है। और फार्मासिस्ट धर्मेंद्र कुशवाहा नियमित रूप से चिकित्सालय में ड्यूटी करते हैं। वहीं, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी सोनी कुशवाहा की ड्यूटी अलग-अलग दिनों में सिंगापट्टी, सेमरा हरदो पट्टी और पटहेरवा स्थित होम्योपैथिक चिकित्सालयों में निर्धारित होने की जानकारी मिली है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि निर्धारित दिनों में महिला चिकित्सक की उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि चिकित्सक नियमित रूप से अस्पताल नहीं पहुंच रही हैं, तो संबंधित विभाग द्वारा अब तक क्या कार्रवाई की गई है? इन सवालों का जवाब विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।


होम्योपैथिक चिकित्सा के प्रति मरीजों का भरोसा कमजोर होने की शिकायत

स्थानीय ग्रामीण महिला प्रभावती देवी पत्नी प्रकाश का घर हॉस्पिटल के पास ही है उसका आरोप है कि महिला चिकित्सक महीने में कभी कभार आती है और जब वे इलाज के लिए महिला चिकित्सक के पास पहुंचते हैं, तो कथित तौर पर उन्हें होम्योपैथिक चिकित्सा से लाभ नहीं मिलने की बात कही जाती है। इसके बावजूद व होम्योपैथी की दवा खाती है। इसी के साथ सिंगापट्टी करमहवा निवासी दूसरी महिला अंजली देवी पत्नी जलेसर गोंड ने बताया कि वह इलाज कराने आई है लेकिन महिला चिकित्सक मौके पर नहीं मिली इसलिए खाली हाथ लौट रही हूं इसके पूर्व भी जब भी मैं आई हूं महिला चिकित्सक नही मिलती है जिसके कारण मेरा इलाज नहीं हो पा रहा है।

ग्रामीणों का दावा है कि इस तरह के व्यवहार से लोगों का होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के प्रति विश्वास प्रभावित हो रहा है। कुछ ग्रामीणों ने चिकित्सक से शिकायत करने पर दुर्व्यवहार किए जाने का आरोप भी लगाया है। यदि इस शिकायतो का संज्ञान लिया जाए तो यह  मामला केवल ड्यूटी में लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीजों के साथ व्यवहार और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है।

छुट्टी के आवेदन और मेडिकल प्रमाणपत्रों की भी हो जांच

सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया जा रहा है कि चिकित्सक की अनुपस्थिति के संबंध में छुट्टी के आवेदन और मेडिकल प्रमाणपत्रों की व्यवस्था समय से कर ली जाती है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि संबंधित चिकित्सक की छुट्टियों का विवरण क्या है, उपस्थिति पंजिका में दर्ज हाजिरी वास्तविक है या नहीं और निर्धारित ड्यूटी के दिनों में उनकी मौजूदगी सुनिश्चित की गई या नहीं।

ग्रामीणों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि यदि चिकित्सक लंबे समय तक अस्पताल से अनुपस्थित रहती हैं, तो उनकी नियमित उपस्थिति दर्ज होने की प्रक्रिया की निगरानी कौन करता है? इन आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए उपस्थिति रजिस्टर, अवकाश अभिलेख और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट की जांच जरूरी है।

18 वर्षों से पुराने पंचायत भवन में संचालित है अस्पताल

राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय बांसी मेला की बदहाली का एक बड़ा कारण उसके भवन की स्थिति भी है। जानकारी के अनुसार, यह चिकित्सालय करीब 18 वर्षों से ग्राम पंचायत के पुराने भवन में संचालित हो रहा है। समय के साथ भवन की हालत जर्जर होती गई, लेकिन इसकी मरम्मत, साफ-सफाई और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देने की शिकायतें हैं। अस्पताल में रखी कुर्सियां और मेजें टूट-फूट का शिकार हैं। परिसर में गंदगी की शिकायतें भी सामने आई हैं। ऐसी स्थिति में अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सामना करना पड़ता है। सवाल यह है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संचालित चिकित्सालय में मरीजों के बैठने, साफ-सफाई और सुरक्षित भवन जैसी आवश्यक सुविधाएं अब तक दुरुस्त क्यों नहीं हो सकीं?

निरीक्षण और जवाबदेही पर टिकी निगाहें

लोकभारती टीम के निरीक्षण के दौरान महिला चिकित्सक की अनुपस्थिति सामने आने के बाद अब विभागीय निगरानी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। यदि चिकित्सालय में नियमित निरीक्षण किया जाता है, तो ड्यूटी में कथित लापरवाही और बुनियादी सुविधाओं की बदहाली का समय रहते पता क्यों नहीं चला? वहीं, यदि शिकायतें पहले से अधिकारियों के संज्ञान में थीं, तो उनके निस्तारण के लिए क्या कदम उठाए गए? अब जरूरत केवल आश्वासन की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई की है। संबंधित अधिकारियों को चिकित्सक की निर्धारित ड्यूटी, उपस्थिति पंजिका, अवकाश अभिलेख और अस्पताल की व्यवस्थाओं की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। साथ ही, भवन की मरम्मत, साफ-सफाई और मरीजों को नियमित उपचार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। सरकारी अस्पताल जनता को स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए हैं, केवल कागजों पर व्यवस्था दिखाने के लिए नहीं। ऐसे में बांसी मेला स्थित राजकीय होम्योपैथिक चिकित्सालय की बदहाली दूर करना और मरीजों को नियमित उपचार उपलब्ध कराना विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

 

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