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पंचायतों में भुगतान का खेल या नियमों की अनदेखी? राजेपुर में उठे सवाल, जांच की आंच में तीन ग्राम पंचायतें

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पेंटिंग से सफाई, दवा छिड़काव से खड़ंजे तक खर्च की पड़ताल जरूरी; बिरसिंहपुर में ईंटों से 72 हजार रुपये अधिक मजदूरी का भुगतान, हुसैनपुर हड़ाई में पुरानी खरीद के बाद फिर कुर्सियां खरीदने पर सवाल

लक्ष्मी शरण सिंह राठौड़

फर्रुखाबाद l ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी धनराशि की निगरानी और पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। विकास खंड राजेपुर की ग्राम पंचायत पिथनापुर, बिरसिंहपुर और हुसैनपुर हड़ाई में विभिन्न मदों में किए गए भुगतानों का जो विवरण सामने आया है, उसने कार्यों की वास्तविकता, खर्च की आवश्यकता और भुगतान प्रक्रिया के सत्यापन की जरूरत बढ़ा दी है। कहीं सफाई और संचारी रोग नियंत्रण के नाम पर एक ही एजेंसी को भुगतान किए जाने की जानकारी है, तो कहीं खड़ंजा निर्माण में ईंटों की लागत के मुकाबले मजदूरी का खर्च कहीं अधिक दर्ज होने का मामला सामने आया है। दूसरी ओर, पंचायत कार्यालय में पहले फर्नीचर खरीदने के बाद दोबारा कुर्सियां खरीदने की जरूरत पर भी सवाल उठ रहे हैं।

 

मामला केवल कुछ भुगतानों के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। असल सवाल यह है कि सरकारी धनराशि खर्च करने से पहले कार्यों की आवश्यकता का आकलन किस आधार पर हुआ, काम की गुणवत्ता और मात्रा का सत्यापन किसने किया तथा भुगतान के लिए प्रस्तुत बिलों की जांच किस स्तर पर की गई। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करने की मांग उठाई है।

पिथनापुर में अलग-अलग मद, भुगतान का एक ही नाम

ग्राम पंचायत पिथनापुर में पंचायत सचिव राघवेंद्र सिंह के कार्यकाल में किए गए भुगतानों का विवरण जांच की मांग कर रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यादगार पेंटिंग के लिए 10,665 रुपये तथा बैनर आदि की छपाई के नाम पर भुगतान का उल्लेख है। इसके अलावा सफाई कार्य कराने के नाम पर विधि कॉन्ट्रेक्टर को 19,850 रुपये दिए गए।

संचारी रोग नियंत्रण अभियान के तहत चूना डलवाने और दवा का छिड़काव कराने के नाम पर इसी एजेंसी को 19,890 रुपये का भुगतान दर्ज होने की जानकारी है। प्रशासनिक व्यय के मद में भी 19,950 रुपये दिए जाने का विवरण सामने आया है। वहीं, नाली निर्माण के नाम पर करीब 84 हजार रुपये के भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

इन भुगतानों के बीच सबसे अहम सवाल कार्यों के वास्तविक निष्पादन का है। सफाई कितने क्षेत्र में कराई गई? चूना कहां-कहां डलवाया गया और दवा का छिड़काव कितने स्थानों पर हुआ? संबंधित कार्यों की मात्रा, दर, बिल और कार्यपूर्ति प्रमाणपत्र का आपस में मिलान हुआ या नहीं? यदि भुगतान के अभिलेख मौजूद हैं तो उनका स्थलीय सत्यापन भी होना चाहिए, जिससे कागजों पर दर्ज काम और धरातल पर हुए कार्यों के बीच की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

बिरसिंहपुर में मजदूरी का खर्च ईंटों की कीमत से 72 हजार अधिक

ग्राम पंचायत बिरसिंहपुर में खड़ंजा निर्माण के भुगतान का ब्योरा विशेष रूप से ध्यान खींचता है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, वीरेन्द्र सिंह के घर से रामू के घर तक खड़ंजा निर्माण के लिए ईंटों की खरीद पर 1 लाख 8 हजार रुपये खर्च किए गए, जबकि मजदूरों की मजदूरी के नाम पर 1 लाख 80 हजार रुपये का भुगतान दर्ज है।

इस तरह ईंटों और मजदूरी के इन दो मदों में कुल 2 लाख 88 हजार रुपये खर्च होने का विवरण सामने आया है। मजदूरी का खर्च ईंटों की कीमत से 72 हजार रुपये अधिक है। यह अंतर अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसकी तकनीकी जांच की जरूरत अवश्य पैदा करता है।

निर्माण की कुल लंबाई और चौड़ाई, बिछाई गई ईंटों की संख्या, मजदूरों की संख्या, कार्य में लगे दिनों और निर्धारित मजदूरी दरों का सत्यापन किया जाना चाहिए। इन तथ्यों की जांच के बाद ही पता चलेगा कि दर्ज खर्च वास्तविक कार्य के अनुपात में है या नहीं।

इसी पंचायत में वॉलेट रिचार्ज के नाम पर 4,950 रुपये सीधे पंचायत सहायक के मानदेय खाते में भुगतान किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इस भुगतान का उद्देश्य, स्वीकृति और लेखा अभिलेखों की जांच आवश्यक है। आखिर यह राशि किस कार्य के लिए खर्च की गई और भुगतान का संबंधित खाते में जाना नियमानुसार था या नहीं? इन सवालों का जवाब अभिलेखीय जांच से मिलना चाहिए।

हुसैनपुर हड़ाई में चार साल बाद फिर कुर्सियों की खरीद

ग्राम पंचायत हुसैनपुर हड़ाई में पंचायत कार्यालय के फर्नीचर की खरीद भी सवालों के घेरे में है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022 में कार्यालय के लिए लगभग 72 हजार रुपये का फर्नीचर खरीदा गया था। इसके बाद वर्ष 2026 में 12,250 रुपये की कुर्सियां फिर खरीदे जाने का भुगतान सामने आया है।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि पहले खरीदे गए फर्नीचर की स्थिति क्या थी और नई कुर्सियों की आवश्यकता क्यों पड़ी। क्या पुरानी कुर्सियां खराब हो गई थीं, कार्यालय में उनकी कमी थी अथवा कर्मचारियों और आगंतुकों की बढ़ती जरूरतों के कारण अतिरिक्त खरीद की गई? खरीद की उपयोगिता पर उठ रहे सवालों का समाधान पुराने बिल, स्टॉक रजिस्टर, संपत्ति अभिलेख और नई खरीद के प्रस्ताव की जांच से ही संभव है।

सरकारी धनराशि से खरीदी गई सामग्री का उपयोग और उसका लेखा-जोखा स्पष्ट होना चाहिए। यदि खरीद आवश्यकतानुसार हुई है तो संबंधित अभिलेख उसे प्रमाणित कर सकते हैं। वहीं, यदि प्रक्रिया में कोई कमी पाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए।

तीनों पंचायतों में एक ही एजेंसी के बिल, संयोग या जांच का विषय?

तीनों ग्राम पंचायतों से संबंधित भुगतानों में विधि कॉन्ट्रेक्टर का नाम सामने आने की बात भी महत्वपूर्ण है। जानकारी के अनुसार, सफाई, चूना डलवाने, दवा छिड़काव और अन्य कार्यों के बिल इस एजेंसी के नाम पर लगाए गए हैं। बताया जा रहा है कि एजेंसी से संबंधित व्यक्ति राजेपुर विकास खंड क्षेत्र से लगभग 40 किलोमीटर दूर का निवासी है।

हालांकि, किसी एजेंसी का दूसरे क्षेत्र में पंजीकृत होना अपने आप में अनियमितता नहीं है। लेकिन जब अलग-अलग प्रकृति के कार्यों में एक ही एजेंसी के नाम भुगतान सामने आते हैं, तो उसके पंजीकरण, कार्यक्षेत्र, कार्यादेश, बिलों की वास्तविकता और भुगतान की प्रक्रिया का परीक्षण महत्वपूर्ण हो जाता है।

राजेपुर क्षेत्र में अन्य ठेकेदारों और कार्यदायी एजेंसियों की मौजूदगी के बावजूद संबंधित कार्य इसी एजेंसी को किस आधार पर दिए गए, क्या आवश्यक स्वीकृतियां ली गईं और क्या कार्य वास्तव में कराए गए—इन बिंदुओं पर जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। केवल बिलों के आधार पर किसी गड़बड़ी का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन सवालों की अनदेखी करना भी जवाबदेही के उद्देश्य के विपरीत होगा।

डीपीआरओ बोले—मौके पर जांच होगी, अनियमितता मिली तो कार्रवाई

मामले में जिला पंचायत राज अधिकारी अविनाश चन्द्र चौरसिया ने बताया कि प्रशासक बनने के बाद माननीय न्यायालय के आदेश के अनुसार पुराने लंबित कार्यों को छोड़कर नया कार्य या भुगतान जिलाधिकारी की अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता। उनके मुताबिक, किसी नए कार्य का प्रस्ताव आने पर उसे जिलाधिकारी की अनुमति के लिए भेजा जाता है। अनुमति मिलने के बाद ही नया कार्य स्वीकृत किया जाता है और नियमानुसार भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी ग्राम पंचायत में निर्देशों का पालन किए बिना कार्य कराया गया है या भुगतान किया गया है तो वह स्वयं मौके पर जाकर जांच करेंगे। अनियमितता मिलने पर जिम्मेदार व्यक्ति के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी, ताकि ऐसी कार्रवाई अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी नजीर बने।

सचिव का दावा—छोटे भुगतानों में अनुमति जरूरी नहीं

वहीं, संबंधित ग्राम पंचायतों के सचिव राघवेंद्र सिंह ने भुगतान को लेकर अलग पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि जिलाधिकारी की अनुमति एक लाख रुपये से अधिक के खर्च पर लेनी होती है। छोटे भुगतानों के लिए जिला पंचायत राज अधिकारी या जिलाधिकारी से अनुमति लेने की बाध्यता नहीं है। सचिव ने दावा किया कि पंचायतों में किए गए भुगतान अनियमितता की श्रेणी में नहीं आते हैं।

दोनों पक्षों के बयानों के बीच अब लागू नियमों, न्यायालय के आदेश की वास्तविक शर्तों और प्रत्येक भुगतान की प्रकृति की जांच महत्वपूर्ण हो गई है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस मद में किस स्तर की अनुमति आवश्यक थी और संबंधित भुगतानों में उसका पालन किया गया या नहीं।

अब अभिलेखों और धरातल पर जांच की दरकार

राजेपुर की इन तीन ग्राम पंचायतों में सामने आए भुगतान संबंधी सवालों का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच से होगा। संबंधित बिल, कार्यादेश, भुगतान विवरण, माप पुस्तिका जहां लागू हो, स्टॉक रजिस्टर, कार्यपूर्ति प्रमाणपत्र और मौके पर उपलब्ध निर्माण या सामग्री का मिलान किया जाना चाहिए।

खबर लिखे जाने तक भुगतानों में हुई अनियमितता की स्वतंत पुष्टि नहीं हो सकी अनियमिताओं की पुष्टि लोक भारती समाचार पत्र नहीं करता।

सरकारी धनराशि जनता की अमानत है। उसके खर्च का हर हिसाब स्पष्ट और जांच के दायरे में होना चाहिए। यदि सभी भुगतान नियमों और वास्तविक कार्यों के अनुरूप हुए हैं तो जांच से संबंधित पक्षों की स्थिति स्पष्ट होगी। वहीं, यदि किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। अब देखना यह है कि पंचायत राज विभाग इन सवालों की जांच कितनी गंभीरता से करता है और ग्रामीणों को वास्तविक स्थिति का जवाब कब मिलता है।

 

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