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विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘हरियाली का कत्ल’! सागौन के 14 पेड़ रातों-रात गायब, सवालों के घेरे में वन विभाग

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मुकेश गुप्ता, संवाददाता लोकभारती
मझोला (पीलीभीत)। एक ओर पूरे देश में विश्व पर्यावरण दिवस पर पेड़ बचाने, हरियाली बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण देने की शपथ ली जा रही थी, वहीं दूसरी ओर अमरिया तहसील के ग्राम गिद्धौर स्थित फुलैया फार्म के पास सरकारी नाले किनारे खड़े कीमती सागौन के 14 हरे-भरे पेड़ों का रातों-रात "अंतिम संस्कार" कर दिया गया।
आरोप है कि लकड़ी माफियाओं ने दो आरा मशीनें लगाकर गुरुवार देर रात तक बेखौफ कटान किया और पर्यावरण की इस अमूल्य संपदा को चंद घंटों में धराशायी कर दिया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मार्ग पर निगरानी के दावे किए जाते हैं, वहां इतनी बड़ी कार्रवाई आखिर किसकी नजरों से बचकर हो गई?
ग्रामीणों का आरोप है कि कटान के बाद पेड़ों की जड़ों को सूखे पत्तों और मिट्टी से ढक दिया गया, ताकि सबूत भी मिट जाएं और हरियाली के इस "कत्ल" पर पर्दा भी पड़ जाए। लोगों ने वन विभाग के कुछ जिम्मेदारों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

मामले की प्रमुख बातें
सरकारी नाले किनारे लगे 14 कीमती सागौन के पेड़ काटे गए।
देर रात तक दो आरा मशीनों से कटान होने का आरोप।
जड़ों को मिट्टी और सूखे पत्तों से ढककर सबूत मिटाने की कोशिश।
ग्रामीणों ने वन विभाग पर मिलीभगत और संरक्षण के आरोप लगाए।
विश्व पर्यावरण दिवस पर हुई घटना से विभागीय दावों पर सवाल।

एक तरफ पौधरोपण के फोटो, भाषण और हरियाली बचाने के संदेश...
दूसरी तरफ उसी दिन हरियाली पर चलती आरी।

लगता है पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाने की जिम्मेदारी किसी की है और पेड़ काटने की जिम्मेदारी किसी और की। सवाल यह भी है कि करोड़ों रुपये पौधरोपण पर खर्च करने के बाद यदि वर्षों पुराने सागौन के पेड़ ही सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर पर्यावरण संरक्षण के दावे कितने मजबूत हैं?
...........वर्जन.......
क्या बोले डीएफओ?
"प्रकरण संज्ञान में आया है। मामले की जांच कराई जा रही है। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।"
— डीएफओ
अब सबकी नजर जांच पर
फिलहाल क्षेत्रीय लोगों की निगाहें जांच पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि विश्व पर्यावरण दिवस पर कटे इन पेड़ों की फाइल भी अन्य मामलों की तरह धूल फांकती रहेगी या फिर जांच की आंच वास्तव में दोषियों तक पहुंचेगी। क्योंकि सवाल सिर्फ 14 पेड़ों का नहीं, बल्कि हरियाली बचाने के सरकारी दावों की विश्वसनीयता का भी है।

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