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महाव का कहर: 50 करोड़ खर्च, 60 बार टूटा तटबंध, फिर भी बाढ़ के साये में जी रहे 12 गांव

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नौतनवा, महराजगंज  एक तरफ मानसून की दस्तक के साथ प्रशासन बाढ़ से निपटने की तैयारियों का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारत-नेपाल सीमा से सटे क्षेत्र में बहने वाला महाव नाला आज भी हजारों किसानों और ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। हाल ही में जिलाधिकारी गौरव सिंह सोगरवाल और पुलिस अधीक्षक शक्ति मोहन अवस्थी ने महाव नाला क्षेत्र का निरीक्षण कर तैयारियों की समीक्षा की, लेकिन इलाके के लोगों का सवाल अब भी वही है—आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद महाव की समस्या का स्थायी समाधान कब होगा?

भारत-नेपाल सीमा के पिलर संख्या 16 के पास झिंगटी गांव से भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करने वाला पहाड़ी नाला महाव हर वर्ष बरसात में विकराल रूप धारण कर लेता है। जलस्तर बढ़ते ही रेत से बने तटबंध कमजोर पड़ जाते हैं और टूटने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसका सबसे ज्यादा असर बरगदवा, खैरहवा दूबे, अमहवा, विशुनपुरा, दोगहरा, देवघट्टी, हरखपुरा, झिंगटी, कोहरगड्डी, नरायनपुर, छितवनिया और कनरी-चकरार समेत दर्जनों गांवों पर पड़ता है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले एक दशक में महाव तटबंध करीब 60 बार टूट चुका है। वर्ष 2013 से लेकर 2025 तक अलग-अलग स्थानों पर तटबंध बार-बार ध्वस्त होता रहा। सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्ष 2022 से अगस्त 2025 के बीच ही बरगदवा, हरखपुरा, झिंगटी, कोहरगड्डी और दोगहरा क्षेत्र में 14 से अधिक स्थानों पर तटबंध टूटने की घटनाएं सामने आईं।

ग्रामीणों का आरोप है कि समस्या के समाधान के नाम पर हर वर्ष सिल्ट सफाई, तटबंध मरम्मत और बचाव कार्यों के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 से 2025 के बीच सिंचाई विभाग, वन विभाग और अन्य एजेंसियों द्वारा 50 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन जमीनी हकीकत में स्थिति जस की तस बनी हुई है। पहली ही तेज बारिश या बाढ़ में तटबंध टूट जाते हैं और किसानों की सैकड़ों एकड़ फसलें पानी में समा जाती हैं।

स्थानीय किसानों का कहना है कि महाव अब सिर्फ एक नाला नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों की पीड़ा बन चुका है। हर वर्ष बाढ़ आने पर खेतों में रेत भर जाती है, फसलें बर्बाद हो जाती हैं और गांवों का संपर्क टूट जाता है। कई परिवार ऐसे हैं जो दशकों से इस तबाही को झेल रहे हैं, लेकिन स्थायी समाधान आज तक नहीं मिल सका।

इधर, प्रशासन ने संभावित बाढ़ को देखते हुए संवेदनशील क्षेत्रों पर निगरानी बढ़ाने, राहत एवं बचाव संसाधन तैयार रखने तथा तटबंधों की स्थिति पर विशेष नजर रखने के निर्देश दिए हैं। हालांकि क्षेत्रीय लोगों का मानना है कि केवल निरीक्षण और अस्थायी मरम्मत से काम नहीं चलेगा, बल्कि महाव समस्या के स्थायी समाधान के लिए ठोस और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।

अब सवाल यह है कि आखिर कब तक करोड़ों रुपये खर्च होते रहेंगे और महाव हर बरस किसानों की उम्मीदों को बहाता रहेगा? यह सवाल आज भी सीमा क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों के मन में गूंज रहा है।

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