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रामायणकालीन स्मृतियों को संजोए गंगा बनने की राह पर गोमती

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सुलतानपुर के सीताकुंड घाट पर हर शाम गूंजती है आरती की धुन

सुशील चंद्र मिश्र

सुलतानपुर। नदियां केवल जल की धाराएं नहीं होतीं, बल्कि वे सभ्यताओं की जननी, संस्कृतियों की संवाहक और इतिहास की मौन साक्षी होती हैं। ऐसी ही पवित्र नदियों में शामिल है आदि गंगा गोमती, जो पीलीभीत के गोमत ताल से निकलकर सीतापुर, लखनऊ, सुलतानपुर और जौनपुर की धरती को सींचती हुई अंततः गंगा में समाहित हो जाती है। गोमती की यात्रा महज एक नदी की यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय आस्था, पौराणिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की अनवरत धारा है।

गोमत ताल से शुरू होती है गोमती की जीवन यात्रा

पीलीभीत के माधोटांडा क्षेत्र स्थित गोमत ताल को गोमती का उद्गम स्थल माना जाता है। यहां एक छोटी जलधारा के रूप में जन्म लेने वाली गोमती आगे बढ़ते हुए विशाल नदी का स्वरूप धारण करती है। नदी का उद्गम स्थल हमेशा विशेष महत्व रखता है। छोटी-सी धारा का विशाल नदी में बदलना प्रकृति के उस संदेश को दर्शाता है कि बड़ी यात्राओं की शुरुआत हमेशा छोटे कदमों से होती है।

नैमिषारण्य से अवध तक बहता इतिहास

गोमती अपनी यात्रा में सीतापुर और नैमिषारण्य की पवित्र भूमि को स्पर्श करती है। नैमिषारण्य सदियों से ऋषि-मुनियों की तपस्थली और धार्मिक ज्ञान की भूमि रही है। इसके बाद गोमती अवध की सांस्कृतिक राजधानी लखनऊ पहुंचती है, जहां यह शहर की पहचान का अभिन्न हिस्सा बन जाती है। इसके तटों पर सभ्यताएं विकसित हुईं और समय के साथ इतिहास के पन्ने जुड़ते गए, लेकिन गोमती की यात्रा का सबसे भावनात्मक और पौराणिक अध्याय सुलतानपुर की धरती पर दिखाई देता है।


सुलतानपुर में गोमती बन जाती है रामायण की स्मृति

सुलतानपुर (प्राचीन कुशभवनपुर) में प्रवेश करते ही गोमती का महत्व और बढ़ जाता है। यहां इसके तटों पर स्थित सीताकुंड घाट और धोपाप धाम इसे धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष पहचान देते हैं। लोकमान्यता है कि इन स्थलों का संबंध भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि आज भी हजारों श्रद्धालु इन स्थानों पर पहुंचकर आस्था और आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करते हैं।

रामायणकालीन स्मृतियां संजाए है सीताकुंड घाट

सुलतानपुर शहर के गोमती तट पर स्थित सीताकुंड घाट जनपद की धार्मिक पहचान का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि वनवास काल के दौरान भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने गोमती तट पर विश्राम किया था। माता सीता ने इसी घाट पर स्नान किया था। आज भी शाम के समय जब घाट पर आरती होती है तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। मंदिरों की घंटियां, दीपों की रोशनी और गोमती की शांत धारा मिलकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करती हैं, जिसमें आस्था और परंपरा एक साथ दिखाई देती हैं। सीताकुंड घाट केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सुलतानपुर की सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत केंद्र है।

धोपापःविजय के बाद प्रायश्चित की परंपरा का प्रतीक

लम्भुआ क्षेत्र में गोमती तट पर स्थित धोपाप धाम गोमती के पौराणिक महत्व को और ऊंचाई प्रदान करता है। लोकमान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने रावण वध से जुड़े ब्रह्महत्या दोष के प्रायश्चित के लिए महर्षि वशिष्ठ की सलाह पर गोमती के धोपाप घाट पर स्नान किया था। इसी मान्यता से धोपाप धाम की धार्मिक महत्ता जुड़ी हुई है। धोपाप की सबसे बड़ी सीख यही है कि विजय के साथ विनम्रता और शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आवश्यक है। यही संदेश इस पवित्र स्थल को विशेष बनाता है। रामनवमी और ज्येष्ठ शुक्ल दशमी जैसे अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और गोमती में स्नान कर पूजा-अर्चना करते हैं।

गोमती तटों पर जीवित हैं हजारों वर्ष पुरानी परंपराएं

सुलतानपुर के सीताकुंड और धोपाप के अलावा कादीपुर क्षेत्र का अल्देमऊ नूरपुर गांव भी गोमती तट की आध्यात्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। मान्यता है कि यह स्थान अघोर परंपरा के नौ नाथों में प्रथम नाथ बाबा सत्यनाथ की साधना स्थली रहा है। यहां की मिट्टी में प्राचीन साधना, लोकविश्वास और आध्यात्मिक परंपराओं की स्मृतियां आज भी जीवित हैं। इसलिए गोमती को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि उससे जुड़ी संस्कृति, आस्था और ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखना है।

गंगा में विलीन होकर पूरी होती है गोमती की यात्रा

सुलतानपुर से आगे बढ़ते हुए गोमती जौनपुर की धरती को स्पर्श करती है और अंततः गंगा में समाहित हो जाती है। गोमत ताल से निकलकर सीताकुंड और धोपाप होते हुए गंगा तक पहुंचने वाली गोमती भारतीय संस्कृति में आस्था, परंपरा और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक है। दशकों से गोमती मित्र मंडल प्रत्येक रविवार को विशेष सफाई अभियान चलाकर नदी को स्वच्छ और सुंदर बनाने में जुटा है। संगठन के इस प्रयास की विभिन्न स्तरों पर सराहना होती रही है।

गोमती केवल नदी नहीं, बल्कि सुलतानपुर की पहचान, आस्था की धारा और हमारी सांस्कृतिक विरासत की अमर कहानी है।

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