आज की ताजा खबर

दस हजार की आउटसोर्सिंग नौकरी, 20 हजार का ड्राइवर! अमित सिंह की कमाई का कौन देगा हिसाब ?

top-news

मानदेय दस हजार, ड्राइवर का वेतन 20 हजार! अमित सिंह की आर्थिक हैसियत पर उठे सवाल

पडरौना बिजली उपकेंद्र के अमित सिंह की ‘हैसियत’ चर्चा में

मोहम्मद नईम     

कुशीनगर। जनपद के पडरौना विद्युत उपकेंद्र में आउटसोर्सिंग के जरिए तैनात कंप्यूटर ऑपरेटर अमित सिंह की नौकरी भले ही सीमित मानदेय वाली हो, लेकिन उनकी ठाटबाट वाली जीवनशैली को लेकर विभाग में चर्चाओं का बाजार गरम हैं।विश्वस्त विभागीय सूत्रों का दावा है कि करीब दस हजार रुपये मासिक मानदेय पाने वाले अमित सिंह के पास लाखों रुपये कीमत की लग्जरी कार है जिस पर तैनात ड्राइवर को वह बीस हजार रुपये सेलरी देते है जिसकी खूब चर्चा है। इसके अलावा लाखो रुपये क्रेन और पिकअप है, जिसका इस्तेमाल अक्सर विभागीय कार्यों में भी किया जाता है। यदि ये दावे सही हैं तो सवाल सीधा है कि सीमित मानदेय वाले एक आउटसोर्सिंग कर्मचारी के लिए महंगी कार, चालक, ईंधन, बीमा और रखरखाव का यह खर्च किस आय के स्रोत से पूरा हो रहा है? और क्या विभाग ने कभी यह जानने की कोशिश की उसके कर्मचारी की आय और कथित खर्च के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है?

बतादे कि पडरौना विद्युत उपकेंद्र में आउटसोर्सिंग के जरिए कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर तैनात अमित सिंह की कहानी अनधिकृत रुप से स्टोर के संचालन तक सीमित नहीं रह गई है। अमित की आर्थिक हैसियत और सरकारी कामकाज में निजी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। ऐसे मे अमित की आय, संपत्ति और विभागीय भूमिका का पूरा हिसाब-किताब जांच के दायरे में आना स्वाभाविक है।

दस हजार’ की नौकरी और ‘लाखों’ का खर्च

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक अमित सिंह की आउटसोर्सिंग नियुक्ति को करीब पांच वर्ष हुए हैं। सूत्र यह भी दावा करते हैं कि इसी अवधि में उनकी आर्थिक स्थिति और ठाटबाट में भारी बदलाव हुआ है।यदि 20 लाख रुपये की कार और 20 हजार रुपये मासिक चालक रखने की बात सही है तो केवल वाहन और चालक का खर्च ही आउटसोर्सिंग मानदेय के मुकाबले असामान्य रूप से अधिक है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वाहन, संपत्ति या आय के स्रोत को लेकर किये जा रहे इन दावों की अभी किसी सक्षम जांच एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है। इसलिए अमित पर लगे आरोपो की गहनता से दस्तावेजी जांच जरूरी है।

सवाल सिर्फ कार का नहीं, कमाई के स्रोत का है

कहना ना होगा कि किसी व्यक्ति के पास महंगी कार होना अपने आप में अपराध नहीं है। सवाल तब उठता है जब उसकी आय और  खर्च के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे तो जांच का मुद्दा उठना स्वभाविक है कि आय कितनी है?संपत्ति कितनी है?खर्च कितना है?और पैसा कहां से आया?यदि सब कुछ वैध है तो दस्तावेज इस सवाल का जवाब आसानी से दे सकता हैं।

स्टोर की चाबी भी चर्चा में,  आर्थिक हैसियत भी बना मुद्दा

काबिलेगौर है कि अमित सिंह पहले से ही पडरौना विद्युत उपकेंद्र के संवेदनशील स्टोर पटल को लेकर चर्चा में हैं।आरोप है कि आउटसोर्सिंग ऑपरेटर होने के बावजूद वह लंबे समय से स्टोर से जुड़े कार्य करते रहे, जबकि उनके पास स्टोर का प्रभार होने का कोई लिखित आदेश नही है और न ही आउटसोर्सिंग कर्मचारी को स्टोर जैसे संवेदनशील पटल का प्रभार देने का कोई प्रावधान है। पूछताछ के दौरान  स्टोर के संचालन को लेकर गोरखपुर में तैनात बड़े बाबू  योगेन्द्र गुप्ता का नाम सामने आया है। बताया जाता है कि पडरौना विद्युत उप केन्द्र के स्टोर का चार्ज योगेन्द्र कुमार गुप्ता के पास है जो गोरखपुर मे बडे बाबू के पद पर तैनात है और योगेन्द्र गुप्ता ने ही अपने प्रभाव व रसूख के दम पर अपने निजी लाभ के लिए आउटसोर्सिंग आपरेटर अमित सिंह को मौखिक रुप से पडरौना विद्युत उप केन्द्र के स्टोर का प्रभार सौपा है। ऐसे मे सवाल यह उठता है कि अमित सिंह को किस शासनादेश व नियम के के तहत स्टोर का कार्य सौंपा गया है। अब सवाल यह है कि इसका विधिवत आदेश कहां है? और यदि आदेश नहीं है तो सरकारी विद्युत सामग्री से जुड़े इतने महत्वपूर्ण पटल का संचालन किस व्यवस्था के तहत संचालित होता रहा?


जांच हो तो कार से लेकर स्टोर तक हो जायेगा  सब साफ

जानकारों का कहना है कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं है। विभाग यदि अमित सिंह का वास्तविक मासिक मानदेय, क्रेन का रजिस्ट्रेशन और स्वामित्व,वाहन खरीद का स्रोत,वाहन के विभागीय इस्तेमाल की अनुमति,

ईंधन और रखरखाव का खर्च,चालक को दिए जाने वाले वेतन का स्रोत, स्टोर प्रभार से संबंधित आदेश,तथा स्टोर के स्टॉक और निर्गमन अभिलेख की जांच करा दे तो सारी कलई खुल जायेगी।

 सवाल बड़ा है, जवाब दस्तावेजों से चाहिए

किसी कर्मचारी के पास महंगी कार होना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। लेकिन जब उसी कर्मचारी की आय सीमित हो, वाहन का इस्तेमाल कथित रूप से विभागीय कार्यों में नियमित हो और साथ ही उसके विभागीय दायित्वों को लेकर भी सवाल उठ रहे हों, तो आय, संपत्ति और सरकारी कार्यों में निजी संसाधनों के इस्तेमाल की पारदर्शी जांच जरूरी हो जाती है।  इसलिए इन दावों की वास्तविकता दस्तावेजी जांच से ही स्पष्ट होगी। लेकिन सवाल लगातार बढ़ रहे हैं। दस हजार की नौकरी, लाखों की कार, निजी ड्राइवर और सरकारी कामों में निजी वाहन आखिर इस पूरी कहानी का हिसाब कौन देगा?

https://lokbharti.co.in/ad/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *