लखनऊ। लविवि की फीस वसूली में धांधली की शिकायत कुलपति से करने गए छात्रों से कुलपति की हुई तकरार के एक महीने बाद निष्कासित तीन छात्रों को वापस लेने की मांग को लेकर सरस्वती प्रतिमा पर चल रहा धरना पांचवें दिन भी जारी रहा। धरने को समर्थन देने के लिए अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद के साथ ही बाराबंकी के पूर्व सांसद पीएल पुनिया और लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रमेश श्रीवास्तव भी पहुंचे। अयोध्या से सांसद अवधेश प्रसाद एवं पूर्व सांसद और मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में प्रशासनिक मुखिया रहे पी.एल.पूनिया ने धरना स्थल पर पहुंचकर छात्रों से मुलाकात की, उनकी समस्याएं सुनीं तथा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दर्ज एफआईआर एवं निष्कासन की कार्रवाई पर चिंता व्यक्त की।
दोनों नेताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखना अपराध नहीं है, और छात्रों पर दंडात्मक कार्रवाई के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों को भय का नहीं, बल्कि विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक मूल्यों का केंद्र होना चाहिए। छात्रों द्वारा प्रस्तुत किए गए मुद्दों फीस वृद्धि, पारदर्शिता की कमी और निष्कासन पर नेताओं ने आश्वासन दिया कि इन मामलों को संबंधित उच्च स्तरों तक उठाया जाएगा। सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा कि एक ओर तो लखनऊ विश्वविद्यालय फीस वसूली में गड़बड़ी कर रहा है, दूसरी तरफ छात्रों को बोलने भी नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा कि 3 वर्ष का कार्यकाल होता है, कुलपति उसके बाद हट जाते हैं। उन्होंने कई कुलपति को सड़क पर अकेले पैदल चलते देखा है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा जेब भरने के बजाय छात्रहित के कार्य कुलपति को करने चाहिए, गरीब छात्रों के पैसों का दुरुपयोग करने वाले कुलपतियों को कई बार जेल भी जाना पड़ा है। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की बात नहीं सुनता है तो वे इस मुद्दे को राज्यपाल तक ले जाएंगे और आवश्यकता पड़ने पर संसद में भी उठाया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय में आना चाहिए, न कि उन्हें अपराधी बनाकर प्रस्तुत किया जाए। उनके अनुसार एफआईआर दर्ज कर छात्रों को अनावश्यक रूप से दबाव में लाया जा रहा है, जो उचित नहीं है। पूर्व सांसद श्री पूनिया ने कहा कि जब फीस पारदर्शिता जैसे महत्वपूर्ण सवाल छात्र उठा रहे हैं, तो उनके जवाब देने के बजाय उन्हें निष्कासित करना और मुकदमा दर्ज कराना गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा एक मौलिक अधिकार है और इसे सभी के लिए सुलभ एवं किफायती होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान कार्रवाई विश्वविद्यालय प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाती है और यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं शिक्षा को केवल राजस्व का साधन तो नहीं बनाया जा रहा।
इसी क्रम में पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष रमेश श्रीवासतव ने भी आंदोलन को समर्थन दिया और धरना स्थल पर बैठकर छात्रों के साथ एकजुटता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का दृष्टिकोण ऐसा प्रतीत होता है जिसमें उच्च शिक्षा केवल उन्हीं के लिए सुलभ होती जा रही है जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, जबकि कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए अवसर सीमित होते जा रहे हैं। यह स्थिति समान अवसर की अवधारणा के विरुद्ध है।
छात्रों ने बताया कि वे लंबे समय से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठा रहे हैं, लेकिन संवाद के बजाय उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है।
इस अवसर पर निष्कासित छात्रनेता प्रिंस प्रकाश, विशाल सिंह, हर्षित शुक्ला, लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय सचिव अभिषेक श्रीवास्तव बाबू का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई “अन्यायपूर्ण और दमनकारी” है तथा जब तक उनकी मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं होती, आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहेगा। नेताओं ने छात्रों के संवैधानिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा न्यायपूर्ण शिक्षा व्यवस्था के प्रति समर्थन दोहराते हुए निष्कासन आदेशों एवं अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाइयों की समीक्षा की मांग की।