आज की ताजा खबर

हाईकोर्ट से तीन बच्चों की हत्यारोपी मां फांसी की सजा से बरी

top-news

27 जून 2024 को औरैया के तालेपुर गांव के पास सेंगर नदी में डुबोकर मारने का है मामला

एकमात्र जीवित बचे आठ वर्षीय बच्चे की गवाही को कोर्ट ने माना अविश्वसनीय

साक्ष्य में विरोधाभास और विवेचना में गंभीर खामियां मिलीं, सहआरोपी भी बरी

रोहित अवस्थी

औरैया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने औरैया में चार बच्चों को नदी में डुबोकर मारने के मामले में तीन की हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट से मौत की सजा पाने वाली प्रियंका और उसके सहआरोपी आशीष उर्फ डैनी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन आठ वर्षीय बाल गवाह की अकेली गवाही के आधार पर आरोप सिद्ध करने में विफल रहा। बाल गवाह की गवाही में ऐसे विरोधाभास और परिस्थितियां मिलीं, जिनसे उसे सिखाकर गवाही दिलाए जाने की आशंका पैदा होती है। कोर्ट ने इसे दोषसिद्धि का एकमात्र आधार बनाना असुरक्षित माना।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने प्रियंका की आपराधिक अपील और आशीष की जेल अपील मंजूर करते हुए ट्रायल कोर्ट का 05/10 जुलाई 2025 का फैसला रद्द कर दिया। दोनों को सभी आरोपों से बरी करते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।


सुबह तीन बच्चों के शव मिले, शाम को दर्ज हुई प्राथमिकी

मामला 27 जून 2024 का है। औरैया के तालेपुर गांव के पास सेंगर नदी के पुल के नीचे चार बच्चों में से तीन, छह वर्षीय माधव उर्फ गूंगा, पांच वर्षीय आदित्य उर्फ टिल्ला और चार वर्षीय मंगल के शव मिले थे। ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण ने सुबह पुलिस को सूचना दी थी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर तीनों शवों का पंचायतनामा कराया और उसी दिन पोस्टमार्टम हुआ। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में तीनों की मौत डूबने से होने की बात सामने आई।

हालांकि प्राथमिकी उसी दिन शाम 6:44 बजे मृत बच्चों के चाचा मनीष की ओर से दर्ज कराई गई। इसमें आरोप लगाया गया कि प्रियंका ने अपने देवर आशीष उर्फ डैनी के साथ मिलकर चारों बच्चों को नदी में डुबोने का प्रयास किया। आठ वर्षीय सोनू के बच जाने की बात कही गई। अभियोजन का पूरा मामला काफी हद तक सोनू की गवाही पर निर्भर था।


बाल गवाह की गवाही में विरोधाभास पर कोर्ट ने जताई चिंता

हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के तहत कम उम्र का बच्चा गवाही देने के लिए स्वत: योग्य नहीं हो जाता, लेकिन उसकी गवाही की विश्वसनीयता की अत्यंत सावधानी से जांच जरूरी है। बच्चों के आसानी से प्रभावित होने और उन्हें सिखाए-पढ़ाए जाने की संभावना को देखते हुए उनकी गवाही को विशेष सतर्कता से परखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने पाया कि सोनू के बयान के अनुसार घटना के बाद उसने एक बकरी चराने वाले व्यक्ति से मदद मांगी, जिसने उसे ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण तक पहुंचाया। प्रधान ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस उसे थाने ले गई लेकिन प्रधान ने पुलिस को दी अपनी शुरुआती सूचना में सोनू के वहां पहुंचने या उसके द्वारा घटना बताए जाने का उल्लेख नहीं किया था। कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि सोनू का बयान घटना के दिन दर्ज नहीं किया गया, बल्कि पांच जुलाई 2024 को दर्ज हुआ। कोर्ट के अनुसार इससे घटना के समय मौके पर उसकी मौजूदगी को लेकर गंभीर संदेह पैदा होता है। कोर्ट ने कहा कि उसके बयान में वयस्क रिश्तेदारों के प्रभाव में तैयार किए जाने के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं।


मां द्वारा आठ वर्षीय बेटे को छोड़ देने की कहानी भी अस्वाभाविक

कोर्ट ने अभियोजन की कहानी को मानवीय व्यवहार और संभावनाओं की कसौटी पर भी परखा। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन के अनुसार मां ने चार बच्चों में से तीन की हत्या कर दी, लेकिन आठ वर्षीय बेटे को छोड़ दिया, जबकि वह घटना का प्रत्यक्षदर्शी बनकर उसके खिलाफ गवाही दे सकता था। कोर्ट ने इस परिस्थिति को अभियोजन की कहानी के लिए स्वाभाविक नहीं माना।

प्राथमिकी लिखाने वाले चाचा की गवाही भी भरोसेमंद नहीं मिली

हाईकोर्ट ने प्राथमिकी के वादी मनीष के बयान में भी कई विरोधाभास पाए। उसने एक स्थान पर कहा कि उसे घटना की जानकारी सोनू ने दी थी, जबकि दूसरे स्थान पर उसने कहा कि ग्राम प्रधान से उसे घटना की जानकारी मिली। एक अन्य जगह उसने प्रियंका की चाची से सूचना मिलने की बात कही। इसके अलावा उसने कहा कि पुलिस ने उसके बताए स्थान पर नक्शा तैयार नहीं किया, जबकि विवेचक ने उसके बताए स्थान पर नक्शा तैयार करने की बात कही। कोर्ट ने यह भी देखा कि मनीष के अनुसार वह सुबह करीब नौ बजे घटनास्थल पहुंच गया था, जबकि प्राथमिकी शाम 6:44 बजे दर्ज हुई। वह पंचायतनामे के समय मौजूद होने का दावा करता रहा, लेकिन तीनों पंचायतनामों में वह गवाह नहीं था। इन परिस्थितियों के आधार पर कोर्ट ने उसकी गवाही को भी अविश्वसनीय माना।

खंडपीठ ने कहा कि ग्राम प्रधान जितेंद्र भूषण इस मामले में महत्वपूर्ण गवाह था। सबसे पहले उसी ने पुलिस को घटना की सूचना दी थी। उसी के आवेदन पर पुलिस मौके पर पहुंची और पंचायतनामा व पोस्टमार्टम की कार्रवाई हुई। विवेचक ने भी उसका बयान दर्ज किया था लेकिन अभियोजन ने उसे अदालत में गवाही के लिए पेश नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जब अभियोजन का मामला मुख्य रूप से एक ऐसे बाल गवाह पर आधारित हो, जिसकी गवाही में गंभीर विरोधाभास हों, तब घटना की शुरुआत और पुलिस को पहली सूचना मिलने की वास्तविक परिस्थितियां बताने वाले महत्वपूर्ण गवाह को पेश करना बेहद जरूरी था।

कोर्ट ने विवेचना में भी गंभीर खामियां गिनाईं। इनमें बाल गवाह का बयान घटना वाले दिन दर्ज नहीं करना, घटनास्थल का नक्शा किसके बताए स्थान पर तैयार किया गया इसे लेकर विवेचक के बयानों में विरोधाभास और ग्राम प्रधान की लिखित सूचना के बावजूद उसी समय प्राथमिकी दर्ज न करना प्रमुख था। कोर्ट ने कहा कि ये केवल मामूली प्रशासनिक चूक नहीं थीं, बल्कि इनका सीधा असर अभियोजन के मामले की विश्वसनीयता पर पड़ा।

खंडपीठ ने निष्कर्ष दिया कि अभियोजन प्रियंका और आशीष के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। दोष सिद्धि एक ऐसे बाल गवाह की असमर्थित, विरोधाभासी और पढ़ाई गई प्रतीत होने वाली गवाही पर आधारित थी, जबकि महत्वपूर्ण गवाह को पेश नहीं किया गया और विवेचना में गंभीर कमियां थीं। इसलिए दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।

 

पेपर व डिजिटल मे विज्ञापन हेतु संपर्क करे

संपर्क सूत्र - +91 77549 54126

https://lokbharti.co.in/ad/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *